भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २२७ )

प्रसुर्वनपरायणः सततदुर्गतः सज्जनो ।

रुपाङ्गगगगतःखलो मनसि सप्तशल्यानि मे ॥

दिनका मलिन चन्द्रमा, क्षीणयौवन कामिनी, बिना कमलों का तालाब, सुन्दर सुरतवाला निरक्षर—पूर्व, धनका लोभी स्वामी, दरिद्री सज्जन और राजसभामें दुष्ट—ये सात मेरे हृदयमें कटि की तरह खटकते हैं ।

सारंश यह है कि, सब काम अपने-अपने समय पर अच्छे लगते और अपना फल देते हैं। खेती सूख जाने पर बरसनेसे क्या लाभ ? समय पर चूरू कर, पीछे पछतानेसे क्या फायदा ? पानी आ जानेपर मेंड बाँधनेसे क्या प्रयोजन ? आग लग जाने पर, कुआँ खोदनेसे क्या मतलब ? नदी आजाने पर बन्धा बाँधने और बुढ़ापा आजाने पर शादी करनेसे क्या लाभ ? नीतिमें लिखा है :—

( १ )

निर्वाण दीपे किमु तैलदानं

चौरंगते वा किमु सावधानम् ।

वयोगते किं वनिता-विलासः

पयोगते किं खलु सेतुबन्धः ॥

( २ )

शीतेऽतीते वसनमशनं बासरान्ते निशान्ते

जीडारम्भः कुवल्यदृशां यौवनान्ते विवाहः ॥