शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २२८ )
सेतोर्वन्धः पयसि गलिते प्रस्थिते लघ्वचिन्ता सर्वञ्चैतद्भवति विफलं स्वस्वकाले व्यतीते ॥
दीपक बुभ्रु जाने पर तेल डालनेसे क्या ? चोरके माल ले जाने पर सावधानीसे क्या ? जवानी चली जानेपर बनिता-बिहार से क्या ? जलके चले जाने पर पुल बाँधनेसे क्या ? ॥१॥
जाड़ा चला जाने पर कपड़े पहननेसे क्या ? सर्फ हो जाने पर भोजन करनेसे क्या ? रात बीत जाने पर नीलकमलोंके समान नेत्रोंवाली स्त्रियोंके साथ प्रसङ्ग करनेसे क्या ? जवानी चली जाने पर विवाह करनेसे क्या ? जलके चले जानेपर पुल बाँधनेसे क्या ? प्रस्थान कर देने पर, लघ्व-चिन्तासे क्या ? अर्थात् ये सब अपना-अपना समय बीतने पर निष्फल हैं ॥२॥
बुढ़ापमें चौदह-चौदह और सोलह-सोलह बरसकी उठती जवानीकी कामिनियोंके साथ जो ना-समभ बूढ़े 'खुरांट' विवाह करते हैं ; वे इस श्लोकसे शिक्षा ग्रहण करें । क्या सिरसका फूल हीरोंमें छेद कर सकता है ? ऐसे अशर्मियोंकी इस लोकमें बदनामी होती और परलोकमें उन्हें भयंकर दण्ड मिलता है ! इन की खिरियाँ इनके लात मार कर, या तो कहाँ और रसोईयोंसे आशनाई करतीं अथवा साईस और कोचवानोंके साथ भाग जाती हैं । हाँ, कोई-कोई कलियुगी पतिव्रता, अपने बूढ़े-बालम को, बिना ज़रासा भी कष्ट दिये, संत-मेंतमें पुत्रव्रत देकर, उसके कुलका नाम चला देती अथवा वंशको डूबनेसे बचा लेती है ।