भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २१५ )

भगवा करि-करि मेष, जटिल हवै जागत जामिनि ।

भीख मोंगके खात, कहत हम क्वांडी कामिनि ॥६४॥

सार—स्त्री-त्यागियों को कामदेव नाना प्रकारके दगड देता है ।

64. Those fools, that throw aside the token of king Kamadeva namely the women who are productive of love and all sorts of fortunes, and run after unknown subjects, are cruelly punished by the king Kamadeva, some by being made to roam about naked, some by being made to have their heads shaved, some by being allowed to keep only five bunches of hair on their head and some by being made to beg with a pot in their hand.

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विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णायना-

स्तेऽपि स्त्रीमुखपंकजं सुतलितं दृष्ट्वैव मोहं गताः ॥

शाल्यननं सद्युतं पयोदधिद्युतं भुञ्जन्ति ये मानवा-

स्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तेरत्तागरम् ॥६५॥

विश्वामित्र, पराशर, मरीचि और श्रृंगी प्रभृति बड़े-बड़े विद्वान् ऋषि-मुनि, जो वायु-जल और पत्ते खाकर गुजारा करते थे, लीके मुखकमलको देखकर मोहित हो गये ; तब जो मनुष्य अन्न, ची, दूध, दही प्रभृति नाना प्रकारके व्यञ्जन खाते और पीते हैं, कैसे अपनी