भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २१४ )

जो मूर्ख सब अर्थ और सम्पदोंकी देने वाली, कामदेवकी मुद्रारूपी खियोंको लागकर, स्वर्ग प्रभुतिकी इच्छासे, घर छोड़कर निकल गये हैं, उन्हें विरक्त भेषमें न समझना चाहिए। उन्हें कामदेवने अनेक प्रकारके कठोर दण्ड दिये हैं। इसीसे कोई नंगा फिरता है, कोई सिर मुँडाए घूमता है, किसीने पञ्चकेशी रखाई है, किसीने जटा रखाई है और कोई हाथमें ठीकरा लेकर भीख माँगता फिरता है ॥६४॥

खुलासा—खी कामदेव की मुद्रा या मुहर है। जिस तरह राजकी मुद्रा या मुहर का अनादर करनेवाले को राजा अनेक प्रकारके दण्ड देता है; उसी तरह कामदेव भी अपनी खीरूपी मुद्रा का अनादर करनेवालों को नाना प्रकार के दण्ड देता है। किसीको नङ्गा करके फिराता है, तो किसीसे भीख माँगता है।

यही भाव नीचे की कवितामें और भी स्पष्ट रूपसे भल-कता है :—

कुण्डलिया ।

कामिनि मुद्रा कामकी, सकल अर्थको देत । मूरख याकों तजत हैं, भूटे फलके हेत ॥ भूटे फलके हेत, तजत तिनही को ढाँडे । गहि-गहि मूँडे मूँड, बसन बिन कर-कर छाँडे ॥

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