भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २६ )

इन्द्रियोंको वशमें रख सकते हैं ? यदि वे अपनी इन्द्रियोंको वशमें कर सकें, तो विन्ध्याचल पर्वत भी समुद्रमें तैर सके ॥६॥

खुलासा—कामदेव बड़ा बली है। उसने जब केवल जल, वायु और पत्तो खानेवाले मुनियोंको न छोड़ा ; तब वह घी दूध खाने वालोंको कब छोड़ सकता है ? महामुनि विश्वामित्र जब अपना ज्ञान-ध्यान और विवेक-बुद्धि खोकर स्वर्गीय अप्सरा मेनका की रूपच्छटा पर मुग्ध हो गये ; महर्षि पराशर नाच में बैठे-बैठे अन-जान नाविककी कन्या पर मोहित होगये और हृषा-शर्मको तिला-जलि देकर, दिन-दहाड़े अपनी माया से दिनमें अन्धकार करके, अपनी कामाश्रिकी शान्तिमें मशगूल हो गये ; जब मरीचि और श्रुद्धी जैसे ऋषि वेश्याओंके हाव-भावों पर भर मिटे ; तब साधारण लोग मोहिनियोंकी मोह-पाशसे कैसे बच सकते हैं ? कहा है :—

स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं मुनि मनः

इस पृथ्वी पर स्त्रियोंने किस का मन खण्डित या आकृष्ट नहीं किया ? अर्थात् स्त्रियोंने प्रायः सभी का मन हरा,—सभी के दिलों पर अपनी छाप जमाई।

व्यप्य ।

कौशिकादि मुनि भये, वात-पय-पर्णाहारी । तेहू तित्य-सुख-कमल देख, सब बुद्धि विसारी ॥