शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २१२ )
मित्र और पराशर प्रभृति महर्षियों से भी अधिक इन्द्रिय-विजयी समझते हैं? स्त्री पुरुष—अग्नि और वी, आग और फूँस अथवा चुम्बक पत्थर और लोह के समान हैं। वी और आग के पास-पास होते ही वी पिघलने लगता है। फूँस के पास अग्नि के आते ही फूँसमें भट से आग लग जाती है। चुम्बक के सामने लोहा आते ही, चुम्बक लोहेको अपनी ओर खींचता है। ये नेचरल (Natural) या स्वाभाविक मामले हैं, इनमें मनुष्यका वश नहीं। इसी लिये महात्माओं ने कहा है :—
नारी निरखि न देखिये, निरखि न कीजे दौर।
देखत ही तें विष चढ़े, मन आवे कहु और ॥
सर्व सोनाकी सुन्दरी, आवे बास-सुवास।
जो जननी हो आपनी, तोहू न बैठे पास ॥
स्त्री को कभी घूर कर न देखना चाहिये, उस से आँखें न मिलानी चाहियें। क्योंकि स्त्रीके देखने से ही विष चढ़ता है और फिर मन बिगड़ जाता है।
अगर सुन्दरी सोने की भी हो और उसमें सुगन्ध आ रही हो, यदि वह अपने पैदा करनेवाली महतारी हो, तोभी उसके पास न बैठना चाहिये।
आशा है, हमारे देश के सीधे-सादे लोग इन पंक्तियों पर ध्यान दे, अपने घरोंकी इज्जत-आबरू पर पानी न फिलने देंगे।