शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( १६५ )
ही नहीं। तेरा शरीर दिन-दिन क्षय हो रहा है और तेरी इन्द्रियाँ तुझे विषय-भोगों और कुकर्मोंकी तरफ ले जा रही हैं। पहले तू भीतरी शत्रु—काम, क्रोध, मोह, लोभ प्रभृति और अपने मन तथा इन्द्रियोंको वशमें कर, तब मैं तुझे “सर्वजीत” खुशीसे कहूँगी। देख, व्यास भगवान्ने कहा है :—
न रणे विजयाच्छूरोऽव्ययनान पण्डितः ।
न वक्ता वाक्पटुत्वेन न दाता चार्थदानतः ॥१॥
इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः ।
हितप्रायोक्तिर्भिवक्ता दाता सम्मानदानतः ॥२॥
रण-क्षेत्रमें विजयी होनेसे कोई शूर नहीं हो सकता ; शास्त्र पढ़नेसे कोई पण्डित नहीं हो सकता, धड़ाधड़ व्याख्यान देनेसे कोई वक्ता नहीं हो सकता और धन दान करनेसे कोई दाता नहीं हो सकता।
जों इन्द्रियों पर जय प्राप्त करता है, वह शूरवीर कहलाता है ; जो धर्मपर चलता है, वह पण्डित कहलाता है ; जो हित-कारी बाते कहता है, वह वक्ता कहलाता है और जो दूसरोंका आदर-सम्मान करता है, वह दाता कहलाता है
व्यपय ।
हाथी भारनहार, होत ऐसेहू शूरे ।
मुगपति वध कर सकें, बके नहिं नेकहु पूरे ॥
( १६६ )
बड़े-बड़े बलवन्त वीर, सब तिनके आगे । महाबली ये काम, जाहि देखत सब भागे ॥ अभिमान भरे या मदनको, मान मार मेटे अविधि । नर धरम-धुरन्धर वीर हैं, विले या संसार-मधि ॥५८॥
सार—शूरवीर इस जगत्में बहुत हैं ; पर कामिनियोंके कटाक्ष-वाणोंसे घायल न होने- वाला सच्चा शूरवीर शायद ही कोई एक हो ।
58. There are many a hero on this earth who can tear the head of a mad elephant and there are also many powerful enough to kill a fearful lion but I can challenge all the strong men and say that there are few who can fully control the excitements of passions.
—*
सन्मार्गे तावदान्ते प्रभवति स नरस्तावदेवेन्द्रियाणां लज्जां तावद्विधते विनयमपि समालम्बते तावदेव ॥ भूवापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथगता नीलपञ्चमाण एते यावल्लीलावतीनां हृदि न धृतिमुषो दृष्टिवाणाः पतन्ति ॥५९॥
पुरुष सन्मार्गमें तभीतक रह सकता है, इन्द्रियोंको तभीतक वशमें रख सकता है, लज्जाको उसी समय तक धारण कर सकता है, नम्रताका अवलम्बन उसी समय तक कर सकता है, जबतक कि लीलावती स्त्रियोंके भौंह रूपी धनुषसे कानोंतक खींचे गये, श्याम
( १६७ )
वरोनी रूपी पंख धारण किये, धीरजको बुझानेवाले नयन-रूपी वाण हृदयमें नहीं लगते ॥५६॥
खुलासा—पुरुष उसी समय तक सन्मार्गी, इन्द्रियविजयी, लज्जाशील और विनीत रहता है, जब तक वह कामिनीके कटाक्ष से घायल नहीं होता अथवा उसकी किसी नाज़नीसे आँखें नहीं लड़ती। आँख लड़ते ही, वह उसकी एक-एक अद्दा पर पागल हो जाता है और वक्रौल महाकवि ग़ालिब यही कहता है—
बलाये जाँ है ग़ालिब ! उसकी हर बात । इबारत क्या, इबारत क्या, अद्दा क्या ॥
उसका देखना-भालना, लिखना-बोलना सभी ग़ज़ब दाहने वाले हैं।
बहुत लिखना व्यर्थ है, चंचल-नयनी कामिनीसे चार नज़र होते ही मनुष्यके शान्ति, सन्तोष, लज्जा और शर्म सब हवा हो जाते हैं। उस्ताद ज़ौन्नै ठीक ही कहा है :—
छोड़ा न दिलमें, सब आराम न शिकेव । तेरी निगाहने साफ़ किया, घरके घर पै हाथ ॥
तेरी दृष्टिने सब-सन्तोष, शान्ति और सुख सबका पटड़ा कर दिया—(इतना ही नहीं) सारे घर पर ही हाथ साफ़ कर दिया।
( १६८ )
कामिनीके कटाक्षका मारा पुरुष कामानुर हो जाता है ; उस समय उसमें भय, लज्जा और धीरज नहीं रहता । वह डर-भय और लाज-शर्मको ताक पर रखकर, अधीर हुआ, उसके देखने, मिलने और आल्लिङ्गन करनेके लिये छटपटाता है । उसको एक प्रकारका नशा सा हो जाता है ; इसलिये वह सारे काम मत-वालोंकेसे किया करता है । लोगोंके समझाने-बुझानेका कुछ फल नहीं होता । वेदान्तियोंकी वेदान्त-विद्या, भागवतियोंकी भागवत और गीतावालोंका गीता, इस मौक़े पर कुछ भी काम नहीं करते ; सभी निष्फल हो जाते हैं ।
क्षेमेन्द्र महाशयने ठीक ही कहा है—
न श्रूतेन न वितेन न वृत्तेन न कर्मणा ।
प्रवृत्तं शक्यते रोदृषु मनोभवपथेभ्यः ॥
कामदेवकी राह पर आया हुआ मन किसी भी उपायसे उस राहसे हटाया नहीं जा सकता ।
बकौल महाकवि दाग, नाज़नियोंके निगाहे तीरके घायलोंकी अपनी कही सुनिये :—
नाम निकला तो कभी दिलसे कभी आहोफुगों ।
पर तेरे वस्त्रका अरमान निकला ही नहीं ॥
मेरे दिलसे कभी आह निकलती है, तो कभी दीर्घ निःश्वास ; पर तेरे मिलनेकी चिरपालित अभिलाष कभी नहीं निकलती ।
( १६६ )
है तेरी राहे सुहन्वतमें हज़ारों फ़ितने ।
देख, सुफ़को वजुज इस राहके चलता ही नहीं ॥
तेरे प्रेमकी राहमें हज़ारों विघ्न-बाधायें हैं ; किन्तु मुझे देख, कि उस राह पर चले बिना मेरा मनही नहीं मानता ; यानी मैं और राहका पथिक बनना नहीं चाहता ।
दोहा ।
इन्दी-दम लज्जा विनय, तौं लों सब शुभ कर्म ।
जौं लों नारी-नयन-शर, छेदत नाही मर्म ॥५६॥
सार—स्त्रियोंके नयन-वाण लगते ही पुरुष के लज्जा और नेत्रता प्रभृति गुण हवा हो जाते हैं ।
59. A man is in right path, has his passions under his control and has modesty and humility in him only so long as the eyes of women with beautiful eye-lids in the form of arrows with wings, stealing the patience, thrown from brows in the form of bows that are strung up to the ears, do not pierce the heart.
—*—
उन्मत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः ।
तत्र प्रत्यूहमाथातु ब्रह्मपि खलु कातरः ॥६०॥
( १६८ )
कामिनीके कटाक्षका मारा पुरुष कामानुर हो जाता है ; उस समय उसमें भय, लज्जा और धीरज नहीं रहता । वह डर-भय और लाज-शर्मको ताक पर रखकर, अधीर हुआ, उसके देखने, मिलने और आलिकून करनेके लिये छटपटाता है । उसको एक प्रकारका नशा सा हो जाता है ; इसलिये वह सारे काम मत-वालोंकेसे किया करता है । लोगोंके समझाने-बुझानेका कुछ फल नहीं होता । वेदान्तियोंकी वेदान्त-विद्या, भागवतियोंकी भागवत और गीतावालोंका गीता, इस मौकै पर कुछ भी काम नहीं करते ; सभी निष्फल हो जाते हैं ।
क्षेमेन्द्र महाशयने ठीक ही कहा है—
न श्रूतेन न वितेन न वृत्तेन न कर्मणा ।
प्रवृत्तं शक्यते रोदुं मनोभवपथेमनः ॥
कामदेवकी राह पर आया हुआ मन किसी भी उपायसे उस राहसे हटाया नहीं जा सकता ।
बकुल महाकवि दाग, नाइनियोंके निगाहे तीरके घायलोंकी अपनी कही सुनिये :—
नाम निकला तो कभी दिलसे कभी आहोफुगों ।
पर तरे वस्त्रका अरमान निकला ही नहीं ॥
मेरे दिलसे कभी आह निकलती है, तो कभी दीर्घ निःश्वास ; पर तेरे मिलनेकी चिरपालित अभिलाष कभी नहीं निकलती ।
( १६६ )
है तेरी राहे सुहृत्त्वमें हज़ारों फ़ितने ।
देख, सुभक्तो वजुज इस राहके चलता ही नहीं ॥
तेरे प्रेमकी राहमें हज़ारों विघ्न-बाधयें हैं ; किन्तु मुझे देख, कि उस राह पर चले बिना मेरा मनही नहीं मानता ; यानी मैं और राहका पथिक बनना नहीं चाहता ।
दोहा ।
इन्द्दी-दम लज्जा विनय, तौं लों सब शुभ कर्म ।
जौं लों नारी-नयन-शर, छेदत नाही मर्म ॥५६॥
सार—स्त्रियोंके नयन-वाण लगते ही पुरुष के लज्जा और नेत्रता प्रभृति गुण हवा हो जाते हैं ।
59. A man is in right path, has his passions under his control and has modesty and humility in him only so long as the eyes of women with beautiful eye-lids in the form of arrows with wings, stealing the patience, thrown from brows in the form of bows that are strung up to the ears, do not pierce the heart.
—*
उन्मत्तप्रेमसंस्मादारभन्ते यदंगनाः ।
तत्र प्रत्युहमाधातुं ब्रह्मपि खलु कातरः ॥१०॥
( २०० )
अतिशय प्रेमकी उर्मगसे उन्मत्त होकर खिंचाँ। जिस कामको आरम्भ कर देती हैं, उस काममें विन्म-बाधा उपस्थित करते ब्रह्मा भी डरता है ॥६०॥
खुलासा—इश्वरके जोश और जल्दीमें स्त्री जो काम कर बैठती है, उससे उसे मनुष्य तो कौन चीज़ है, स्वयं ब्रह्मा भी नहीं रोक सकता। स्त्री अत्यन्त काम-पीड़ित होने पर जो छल-बल और साहसके काम करती है, उनको देखकर उसके बनाने वाला ब्रह्मा भी दाँतों तले अँगुली देने लगता है। सास-ससुर, पति-पुत्र कोई भी उसे कुकर्मोंसे विरत कर नहीं सकते।
कामवती स्त्री अत्यन्त कुटिल, क्रूर आचरण वाली और लज्जाहीना हो जाती है। उस समय वह अपने पति, पिता, माता, पुत्र, वन्धु और कुटुम्बी तकसे द्रोह करने और उनका नाश करनेमें भी नहीं हिचकती। धमासान युद्धक्षेत्रमें भी वह बन्दूककी गोलियों और तोपोंके गोलोंकी परवा न करके, यदि उसे जाना हो, तो पहुँचती है। जिस श्मशान पर अकेला-डुकेला मर्द भी न जा सकता हो, उस पर वह घोर अँवारी रातमें बादलोंके गरजने, विजलीके कड़कने और ऐसी ही अनेक आप-दाओंके होने पर भी—बेघड़क पहुँचती है। स्त्रीके साहस की बात न पूछिये। ऐसा कौनसा काम है, जिसे वह, इच्छा करने पर, नहीं कर सकती ? किसी पाश्चात्य विद्वान्ने भी कहा है :— “A woman when she either loves or hates, will dare anything.” स्त्री जब प्रेम या घृणा किसी एक पर
( २०१ )
तुल जाती है, तब सब कुछ करनेका साहस कर सकती है। किसी कविने कहा है :—
कहा न श्रवल्ला कर सके* ? कहा न सिन्धु समाय ? कहा न पावकमें जरे ? काहि काल नहि खाय ?
“रसिक” कविने भी कहा है—
दोहा ।
कहा त्रिया नहि कर सके, कामवती जब होय ? “रसिक” सास पति पुल सब, कर न सके कछुकोय ॥३०॥
दोहा ।
महामत् या प्रेमको, जब तिय करत उदोत । तब वाके छलवल निरखि, विधिहू कायर होत ॥
सा२—कामोन्मत्त स्त्री जो चाहे सो कर सकती है ।
60. Even Brahma ( the creator ) has not the power to obstruct the work which a woman undertakes being impassioned with the excitements of love.
ॐ एक पुत्र छोड़ कर स्त्री सब कुछ कर सकती है । केवल यहीं उसकी नहीं पसंदी ।
—*—
( २०२ )
तावन्महत्त्वं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकिता ।
यावद्ग्वलति नांगेषु हन्त पञ्चधुपावकः ॥६१॥
बड़ाई, पण्डिताई, कुलीनता और विवेक,—मनुष्यके हृदय में तभीतक रह सकते हैं, जबतक शरीरमें कामाग्नि प्रज्वलित नहीं होती ॥६१॥
खुलासा—इश्वरमें जात-पांति और नीच-ऊँचका विचार नहीं है। कामी पुरुषोंके विवेक या सत् असत् की विचारशक्ति को तो स्त्रियाँ अपनी एक नज़रमें ही हर लेती हैं। जब भले और बुरेको विचारनेकी शक्ति नहीं रहती, तब मनुष्यमें कुलीनता प्रभृति गुण कैसे रह सकते हैं? अनेक पुरुष मुसलमानियोंके प्रेम में फँसकर मुसलमान हो गये हैं। कितने ही मेमोंके मोहजाल में फँसकर अपने हिन्दुत्व और ब्राह्मणत्वको तिलाञ्जलि देकर काले साहब बन गये हैं। यह तो कुछ नहीं, हमने कितने ही उच्च कुलके हिन्दू मेहतरानियोंके इश्वरमें गिरफ्तार होकर मेहतर होते देखे हैं। इसमें ज़रा भी शक नहीं कि, कामाग्निके प्रज्वलित होते ही, बड़प्पन और कुलीनता प्रभृति हवा हो जाते हैं।
जबसे अंगरेज़ी राज इस देशमें हुआ है, अनेकों अमीरोंके लड़के, भारतमें बी० ए०, एम० ए० पास करके, वैरिष्ट्री या सिविल सर्विसकी परीक्षा पास करने इंग्लैण्ड जाते हैं। ये विद्वान् नवयुवक वहाँकी मिसोंकी लूनाई, सुखड़ाई और रूप-माधुरी देखकर पागल हो जाते हैं। कितने ही उनको व्याह लाते हैं और इस तरह
( २०३ )
अपने दीनो ईमान या धर्मको खोकर जातिच्युत होते हैं। यहाँके लोग उनकी हँसी उड़ाते और घोर-घोर निन्दा करते हैं। पर इससे होता क्या है ? उनके वशकी बात नहीं। नवयौवना मिसोंसे चार नज़र होते ही, वे अपनी विद्या-बुद्धिको भूलकर उन पर पागल हो जाते हैं। महाकवि अकबरने ऐसे ही एक लन्दन-प्रवासीका, जो एक मिसके केश-पाशमें फँस गया था, अच्छा चित्र खींचा है :—
रात उस मिससे कलीसोंमें हुआ मैं दोचार । हाय वह हुस्न वो शोखी वो नज़ाकत वो उभार ॥ जुल्फ-पेचाँमें वो सजधज कि बलायँ भी सुरीद । कड़े-राना मैं वो चमखम कि कयामत भी शहीद ॥ दिलकशी चालमें ऐसी कि सितारे रुक जायँ । सरकशी नाजमें ऐसी कि गवर्नर भुक जायँ ॥ आतिशे हुस्न से तक्वा को जलाने वाली । विजलिथँ लुल्फे-तवस्सुम से गिराने वाली ॥ पिस गया लोट गया दिलमें सकत ही न रही । सुर थे तमकीनके जिस गतमें वो गत ही न रही ॥ अर्जकी मैंने कि ऐ गुलशने-फ़ितरतकी बहार ! दौलतों इज्जतों ईमाँ तेरे कदमें प निसार ॥ तू अगर अहदे वफा बाँधके मेरी हो जाय । सारी दुनियासे मेरे क़ल्बको सेरी हो जाय ॥
( २०४ )
रातके समय उस मिससे गिरजेमें मेरी मुठभेड़ हो गई। हाय ! उसके रूप-लावण्य, उसकी चञ्चलता, उसकी जवानीके उभारका बयान कैसे करूँ ? उसकी पेचदार लट्ठोंमें वह बलाकी सजधज थी कि, जिसको देखकर बलायें स्वयं उसका लोहा मान लें। उसके नाजूक शरीरमें वह चमक-दमक कि, जिसको देखकर प्रलय भी उस पर मरने लगे। उसकी चालमें ऐसी कशिश कि, जिसको देखकर सितारोंकी चाल भी मन्दी पड़ जाय। उसके हाव-भावोंमें ऐसी ऐंट कि, जिसको देखकर गवर्नर लोग भी उसके सामने सिर झुका दें। उसकी खूबसूरतीमें ऐसी लपट कि, जिससे सदाचारके भाव भस्म हो जायँ। उसकी मन्द-मुसक्यानमें ऐसी चकाचौंध कि, जिससे प्रेमीके दिलपर बिजली गिर पड़े। उसके देखते ही मेरा दिल पिस गया और मेरे शरीरकी सारी ताकत निकल गई। मैं ज़मीनपर बेहोश होकर लोटने लगा। धीरजके स्वर जिस गतमें बज रहे थे, वह गत ही हृदयमें न रही। मैंने कहा—“ऐ प्रकृतिकी कुलवाड़ीकी बहार ! मेरा धन-धर्म और मान-मर्यादा सब तेरे चरणोंमें अर्पण हैं। यदि सच्ची मुहब्बतकी प्रतिज्ञा करके, तू मेरी हो जाय, तो मेरा जी सारे संसारसे भर जाय।
दोहा ।
बुद्धि विवेक कुलीनता, तौं लों ही मन माहिं । कामवाण की अग्नि तन, जौं लों धधकत नाहिं ॥६१॥
( २०५ )
सार—प्रेम—कुलीनता, विवेक और पाण्डित्य प्रभृति सद्गुणोंका शत्रु है ।
61. Respectibility, wisdom, good sense and family distinction find place in a man only so long as the fire of passion has not begun to burn in him.
—*
शास्त्रज्ञोऽपि प्रथितविनयोऽप्यात्मबोधोऽपि बाधं
संसारेऽस्मिन् भवति विरलो भाननं सद्दीनाम् ॥
येनेतस्मिन्नेत्यनगरद्वारमुद्घाटयन्ती
वामाचीणां भवति कुटिलश्रूलता कुञ्चिकेव ॥६२॥
शास्त्रज्ञ, विनयी और आत्मज्ञानियोंमें कोई विरला ही ऐसा होगा, जो सद्गतिका पात्र हो ; क्योंकि यहाँ वामलोचना स्त्रियोंकी बाँकी श्रू-लता-रूपी कुञ्जी उनके लिए नरकद्वारका ताला खोले रहती है ॥६२॥
खुलासा—शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानियोंकी सद्गति तो तभी हो सकती है, जब कि वे कामिनीकी बाँकी भाँहोंकी भूपटमें आनेसे बचें । उनकी कमानसी भाँहोंको देखकर बड़े-बड़े वेदान्तियोंकी अङ्क मारी जाती है । वह हज़ार गीता, भागवत और उपनिषदोंका पाठ करें, हज़ार योगवासिष्ठोंका परीक्षण करें ; पर उनके चित्त पर चढ़ी कामिनीका उत्तरण बहुत कठिन
( २०४ )
रातके समय उस मिससे गिरजेमें मेरी मुठभेड़ हो गई। हाय ! उसके रूप-लावण्य, उसकी चञ्चलता, उसकी जवानीके उभारका बयान कैसे करूँ ? उसकी पेशदार लट्ठोंमें वह बलाकी सजधज थी कि, जिसको देखकर बलायें स्वयं उसका लोहा मान लें। उसके नाजूक शरीरमें वह चमक-दमक कि, जिसको देखकर प्रलय भी उस पर मरने लगे। उसकी चालमें ऐसी कशिश कि, जिसको देखकर सितारोंकी चाल भी मन्दी पड़ जाय। उसके हाव-भावोंमें ऐसी ऐंठ कि, जिसको देखकर गवर्नर लोग भी उसके सामने सिर झुका दें। उसकी खूबसूरतीमें ऐसी लपट कि, जिससे सदाचारके भाव भस्म हो जायँ। उसकी मन्द-मुसक्यानमें ऐसी चकाचौंध कि, जिससे प्रेमीके दिलपर बिजली गिर पड़े। उसके देखते ही मेरा दिल पिस गया और मेरे शरीरकी सारी ताकत निकल गई। मैं ज़मीनपर बेहोश होकर लोटने लगा। धीरजके स्वर जिस गतमें बज रहे थे, वह गत ही हृदयमें न रही। मैंने कहा—“ये प्रकृतिकी फुलवाड़ीकी बहार ! मेरा धन-धर्म और मान-मर्यादा सब तेरे चरणोंमें अर्पण है। यदि सच्ची मुहब्बतकी प्रतिज्ञा करके, तू मेरी हो जाय, तो मेरा जी सारे संसारसे भर जाय।
दोहा ।
बुद्धि विवेक कुलीनता, तौं लौं ही मन माहिं । कामवाण की अग्नि तन, जौं लौं धधकत नाहिं ॥६१॥
( २०५ )
सार—प्रेम—कुलीनता, विवेक और पाण्डित्य प्रभृति सदगुणोंका शत्रु है ।
61. Respectibility, wisdom, good sense and family distinction find place in a man only so long as the fire of passion has not begun to burn in him.
—*
शास्त्रज्ञोऽपि पथितविनयोऽप्यात्मबोधोऽपि बाधं संसारैऽस्मिन् भवति विरलो भजनं सद्गीतानाम् ॥
येनेतस्मिन्नरयनगरद्वारमुद्घाटयन्ती
वामाक्षीणां भवति कुटिलश्रूलता कुञ्चिकेव ॥६२॥
शास्त्रज्ञ, विनयी और आत्मज्ञानियोंमें कोई विरला ही ऐसा होगा, जो सद्गतिका पात्र हो ; क्योंकि यहाँ वामलोचना स्त्रियोंकी बाँकी श्रू-लता-रूपी कुञ्जी उनके लिए नरकद्वारका ताला खोले रहती है ॥६२॥
खुलासा—शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानियोंकी सद्गति तो तभी हो सकती है, जब कि वे कामिनीकी बाँकी भाँहोंकी भूपटमें आनेसे बचें । उनकी कमानस्त्री भाँहोंको देखकर बड़े-बड़े वेदगुप्तियोंकी अङ्क मारी जाती है । वह हजार गीता, भागवत और उपनिषदोंका पाठ करें, हजार योगवासिष्ठोंका परीक्षीलन करें ; पर उनके चित्त पर चढ़ी कामिनीका उत्तरना बहुत कठिन
( २०६ )
हैं। पण्डितेन्द्र जगन्नाथ अपने “भामिनी विलास” में लिखते हैं :—
उपनिषदः परिपीता गीतापि च हतं मतिपथं नीता ।
तदपि न हा विधुवदना मानससदनाद्वबहिर्थाति ॥
उपनिषदोंका पान किया और गीता भी भली भाँति पढ़ा-समझा और मनन किया ; परन्तु हाय ! इतना सब करने पर भी, वह चन्द्रवदनी कामिनी मेरे मनरूपी घरसे बाहर नहीं जाती।
ईश्वरकी राहमें कामिनी और काञ्चन दो घाटियाँ हैं।
अगर संसारमें कामिनी और काञ्चन न होते, तो इस संसारसागरसे तरना और मोक्षलाभ करना कठिन न होता। मोक्षकी राहमें कामिनी और काञ्चन दो घाटियाँ पड़ती हैं। इन घाटियोंको पार करना अति कठिन है। जो इन घाटियोंको लोंघनेमें समर्थ हो, वही सद्गति या मोक्षका अधिकारी हो सकता है। महात्मा कबीर कहते हैं :—
चलूँ चलूँ सब कोइ कहै, पहुँचे बिरला कोय।
एक कलक अरु कामिनी, दुलैभ घाटी दोय ॥१॥
एक कलक अरु कामिनी, ये लौंवी तरवारि ।
चाले ये हरि भजनको, बिच ही लीन्हा मारि ॥२॥
( २०७ )
नारि पराई आपनी, भुगतै नरकै जाय । आगि-आगि सब एकसी, देते हाथ जरि जाय ॥३॥ नारी तो हम भी करी, पाया नहीं विचार । जब जानी तब परिहरी, नारी बड़ा बिकार ॥४॥ नारि नसावे तीन सुख, जेहि नर पासे होय । भक्ति मुक्ति अरु ज्ञानमें, पैठि सके नहिं कोय ॥५॥ एक कनक अरु कामिनी, दोऊ आगिनी माल । देखे ही तैं पर जले, परसि करे पैमाल ॥६॥ जहाँ काम तहाँ राम नहिं, राम तहाँ नहिं काम । दोऊ कबहुँ ना रहैं, काम राम इक ठाम ॥
( १ )
चलूँ चलूँ सब कहते हैं, पर कोई विरला ही पहुँचता है, क्योंकि उस ( भगवान्की ) राह में कनक और कामिनी दो दुर्लब्ध घाटियाँ हैं ।
( २ )
कनक और कामिनी ये दो लम्बी तलवारें हैं । हरिभजनको चले थे, पर इन तलवारोंने बीच राहमें ही मार लिया ।
( ३ )
स्त्री अपनी हो चाहे पराई, भोगनेसे नरकमें जाना ही पड़ता है ; क्योंकि अपनी आग और पराई आग—दोनोंमें ही हाथ देने से हाथ जलता है ।
( २०८ )
( ४ )
जब हममें विवेक-विचार नहीं था, तब हमने भी स्त्री की थी ; लेकिन जब उसका असल तत्व जाना, तब उसे त्याग दी ; क्योंकि स्त्रो बड़ी यिकारवान् है ।
( ५ )
स्त्री तीन सुखोंको नष्ट कर देती है । जिसके स्त्रो होती है, उसे ज्ञान नहीं होता ; अतः ईश्वर की भक्तिमें भी मन नहीं लगता और भक्ति बिना मुक्ति नहीं मिलती ।
( ६ )
कनक और कामिनी दोनों आगकी लपट हैं । इनके देखनेसे ही पर जलते हैं और छूनेसे तो प्राणी नष्ट ही हो जाता है ।
( ७ )
जहाँ स्त्री है वहाँ राम नहीं और जहाँ राम है वहाँ स्त्री नहीं । भगवान्की भक्ति और स्त्रीकी प्रीति दोनों एक ही पुरुष नहीं कर सकता । जिस तरह दिन और रात एकत्र नहीं हो सकते ; उसी तरह राम और काम भी एकत्र नहीं रह सकते ।
सारांश यह, मोक्ष लाभ करने या जन्म-मरणसे बचकर परमपद पानेमें ये स्त्रियाँ ही बाधक हैं । लोग इनके जालमें फँस जाते हैं, अतः जन्म-जन्मान्तर तक नरक भोगते हैं । उनको सद्गति मिलना कठिन हो जाता है । बकुल महाकवि ज्ञौक, कोई समझदार, जहाँदीदा पुरुष हो इस स्त्री-जालमें फसने से बचता है । कहा है :—
( २०६ )
दुनिया है वह सैयाद, कि सब दाममें इसके ।
आजाते हैं, लेकिन कोई दाना नहीं आता ॥
दुनिया वह जाल है कि, इसमें सभी फँस जाते हैं ; कोई बिचारशील हो इसमें फँसनेसे बचता है । जो इस जालमें नहीं फँसता, वही नरकोसे बचता और मुक्ति लाभ करता है ।
छप्यय ।
सब ग्रन्थनके ज्ञानवान अरु नीरिवान नर ।
तिनमें कोउ होत मुक्त-मारगमें तत्पर ॥
सबको देत बहाय, बंक-नयनी यह नारी ।
जाकी बाँकी मौह, नचत अतिही अनियारी ॥
यह कूँची करम कपाटकी, खेलनको जकृत फिरत ।
जिनके न लगत मन हगनमें, ते भवसागरको तरत ॥ ३ ॥
सार—सुन्दरी स्त्रियाँ पुरुषोंकी सद्गतिमें
बाधक हैं ।
62. One may be versed in the Shastras, reputedly wise and humble, but there are few who can claim the higher and better life —after death for, there is the oblique brow of women having beautiful eyes, moving in it which like a key opens the lock of the gate of hell,
—*—
१४
( २१० )
कथः काणः खंजः श्रवणरहितः युच्छविकलो
त्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैराद्यततः ॥
जुवाचामो जीर्णः पिठरककपालपित्तगलः
शुनीमन्वेति स्वा हतमपि निहन्त्येव मदनः ॥६३॥
काना, लँगड़ा, कनकटा और दुमकटा कुत्ता, जिसके शरीरमें अनेक वाव हो रहे हैं, उनसे पीब और राध करते हैं, दुर्गन्धका ठिकाना नहीं है, वावोंमें हजारोंमें कीड़े पड़े हैं, जो भूखसे व्याकुल हो रहा है और जिसके गलेमें हाँड़ीका घेरा पड़ा हुआ है, कामान्ध होकर कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है। हाय ! कामदेव बड़ा ही निर्दयी है, जो मेरेको भो मारता है ॥६३॥
खुलासा-कुत्ता इतने क्रूराँसे व्याप्त होने पर भी, शरीर में दम न होने पर भी और क्षुधासे व्याकुल होने पर भी, कामान्ध होकर, कुतिया के पीछे दौड़ता है। इससे स्पष्ट मालूम होता है कि, कामदेव बड़ा ही नीच और निर्दयी है ; क्योंकि वह मुसीबत से भरते हुएों पर भी, अपने सत्यानाशी वाण छोड़ने में आगा-पीछा नहीं करता। जो कामदेव ऐसे दुर्बलों का यह हाल करता है, वह मावा-मलाई घी-दूध और रबड़ी-पेढ़े खाने वाले सण्ड-मुसण्डोंका तो और भी बुरा हाल करता होगा। धूर्त साधू-सन्त और पण्डे-महन्त जो नित्य माल पर माल उड़ाते हैं, क्या काम-वाणोंसे रक्षित रहनेमें समर्थ हो सकते होंगे ? कदापि नहीं।