भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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ही नहीं। तेरा शरीर दिन-दिन क्षय हो रहा है और तेरी इन्द्रियाँ तुझे विषय-भोगों और कुकर्मोंकी तरफ ले जा रही हैं। पहले तू भीतरी शत्रु—काम, क्रोध, मोह, लोभ प्रभृति और अपने मन तथा इन्द्रियोंको वशमें कर, तब मैं तुझे “सर्वजीत” खुशीसे कहूँगी। देख, व्यास भगवान्ने कहा है :—

न रणे विजयाच्छूरोऽव्ययनान पण्डितः ।

न वक्ता वाक्पटुत्वेन न दाता चार्थदानतः ॥१॥

इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः ।

हितप्रायोक्तिर्भिवक्ता दाता सम्मानदानतः ॥२॥

रण-क्षेत्रमें विजयी होनेसे कोई शूर नहीं हो सकता ; शास्त्र पढ़नेसे कोई पण्डित नहीं हो सकता, धड़ाधड़ व्याख्यान देनेसे कोई वक्ता नहीं हो सकता और धन दान करनेसे कोई दाता नहीं हो सकता।

जों इन्द्रियों पर जय प्राप्त करता है, वह शूरवीर कहलाता है ; जो धर्मपर चलता है, वह पण्डित कहलाता है ; जो हित-कारी बाते कहता है, वह वक्ता कहलाता है और जो दूसरोंका आदर-सम्मान करता है, वह दाता कहलाता है

व्यपय ।

हाथी भारनहार, होत ऐसेहू शूरे ।

मुगपति वध कर सकें, बके नहिं नेकहु पूरे ॥