भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २०७ )

नारि पराई आपनी, भुगतै नरकै जाय । आगि-आगि सब एकसी, देते हाथ जरि जाय ॥३॥ नारी तो हम भी करी, पाया नहीं विचार । जब जानी तब परिहरी, नारी बड़ा बिकार ॥४॥ नारि नसावे तीन सुख, जेहि नर पासे होय । भक्ति मुक्ति अरु ज्ञानमें, पैठि सके नहिं कोय ॥५॥ एक कनक अरु कामिनी, दोऊ आगिनी माल । देखे ही तैं पर जले, परसि करे पैमाल ॥६॥ जहाँ काम तहाँ राम नहिं, राम तहाँ नहिं काम । दोऊ कबहुँ ना रहैं, काम राम इक ठाम ॥

( १ )

चलूँ चलूँ सब कहते हैं, पर कोई विरला ही पहुँचता है, क्योंकि उस ( भगवान्की ) राह में कनक और कामिनी दो दुर्लब्ध घाटियाँ हैं ।

( २ )

कनक और कामिनी ये दो लम्बी तलवारें हैं । हरिभजनको चले थे, पर इन तलवारोंने बीच राहमें ही मार लिया ।

( ३ )

स्त्री अपनी हो चाहे पराई, भोगनेसे नरकमें जाना ही पड़ता है ; क्योंकि अपनी आग और पराई आग—दोनोंमें ही हाथ देने से हाथ जलता है ।