भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 247

( २०६ )

हैं। पण्डितेन्द्र जगन्नाथ अपने “भामिनी विलास” में लिखते हैं :—

उपनिषदः परिपीता गीतापि च हतं मतिपथं नीता ।

तदपि न हा विधुवदना मानससदनाद्वबहिर्थाति ॥

उपनिषदोंका पान किया और गीता भी भली भाँति पढ़ा-समझा और मनन किया ; परन्तु हाय ! इतना सब करने पर भी, वह चन्द्रवदनी कामिनी मेरे मनरूपी घरसे बाहर नहीं जाती।

ईश्वरकी राहमें कामिनी और काञ्चन दो घाटियाँ हैं।

अगर संसारमें कामिनी और काञ्चन न होते, तो इस संसारसागरसे तरना और मोक्षलाभ करना कठिन न होता। मोक्षकी राहमें कामिनी और काञ्चन दो घाटियाँ पड़ती हैं। इन घाटियोंको पार करना अति कठिन है। जो इन घाटियोंको लोंघनेमें समर्थ हो, वही सद्गति या मोक्षका अधिकारी हो सकता है। महात्मा कबीर कहते हैं :—

चलूँ चलूँ सब कोइ कहै, पहुँचे बिरला कोय।

एक कलक अरु कामिनी, दुलैभ घाटी दोय ॥१॥

एक कलक अरु कामिनी, ये लौंवी तरवारि ।

चाले ये हरि भजनको, बिच ही लीन्हा मारि ॥२॥