शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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( ४ )
जब हममें विवेक-विचार नहीं था, तब हमने भी स्त्री की थी ; लेकिन जब उसका असल तत्व जाना, तब उसे त्याग दी ; क्योंकि स्त्रो बड़ी यिकारवान् है ।
( ५ )
स्त्री तीन सुखोंको नष्ट कर देती है । जिसके स्त्रो होती है, उसे ज्ञान नहीं होता ; अतः ईश्वर की भक्तिमें भी मन नहीं लगता और भक्ति बिना मुक्ति नहीं मिलती ।
( ६ )
कनक और कामिनी दोनों आगकी लपट हैं । इनके देखनेसे ही पर जलते हैं और छूनेसे तो प्राणी नष्ट ही हो जाता है ।
( ७ )
जहाँ स्त्री है वहाँ राम नहीं और जहाँ राम है वहाँ स्त्री नहीं । भगवान्की भक्ति और स्त्रीकी प्रीति दोनों एक ही पुरुष नहीं कर सकता । जिस तरह दिन और रात एकत्र नहीं हो सकते ; उसी तरह राम और काम भी एकत्र नहीं रह सकते ।
सारांश यह, मोक्ष लाभ करने या जन्म-मरणसे बचकर परमपद पानेमें ये स्त्रियाँ ही बाधक हैं । लोग इनके जालमें फँस जाते हैं, अतः जन्म-जन्मान्तर तक नरक भोगते हैं । उनको सद्गति मिलना कठिन हो जाता है । बकुल महाकवि ज्ञौक, कोई समझदार, जहाँदीदा पुरुष हो इस स्त्री-जालमें फसने से बचता है । कहा है :—