शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 278, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २३३ )
तन्वीनेनचकोरपावैणविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यःकोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने ॥७१॥
शृंगार रूपी वृद्धोंके सौचनेवाले, क्रीड़ासको विस्तारसे प्रवाहित करनेवाले, कामदेवके प्यारे मित्र, चातुर्थ्यरूपी मोतियोंके समुद्र, कामिनियोंके नेत्ररूपी चकोरोंको पूर्णचन्द्र, सौभाग्य-लक्ष्मीके खजाने—यौवनको पाकर, जो विकारोंके वशीभूत नहीं होते, वे निश्चय ही भाग्यवान् हैं ॥७१॥
खुलासा—यौवन विषयवासनाओंको बढ़ाने वाला और भोग-चिलासका ज्वर्दस्त स्रोता है। यह स्त्रियोंको प्यारा लगनेवाला तथा चतुराई और सुख-सम्पत्तियोंकी खान है। जवानोंमें, मनुष्य की भोगचिलास की इच्छाएँ बहुत ही तेज हो जाती हैं ; इसलिए ये बड़ा ही नाज़ुक समय है। इस अवस्थामें, जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको वशमें रख सकता है, उन्हें कुमार्गमें जानेसे रोक सकता है, वह सबमुच ही भाग्यवान् है। धातुओंके क्षीण होने पर, बुढ़ापा आने पर, तो सभी शान्त हो जाते हैं ; पर इस जवानी दीवानोंमें ही जो शान्त रहे, स्त्रियोंके जालमें न फँसे, वही प्रशंसा-योग्य है। भीष्म पितामहने अपनी सारी उम्र बिना स्त्रीके ही बिता दी ; जीवन-भर ब्रह्मवर्ष-व्रत पालन किया। यदि वे चाहते तो अनेक स्वर्गकी अप्सरायें उनके चरणोंको धो-धोकर पीतीं। पर यदि वे ऐसा करते, तो महाशक्तिशालियोंमें उनकी गणना न होती और संसार उन्हें धर्मधुरीण शूरशिरसोमणि न कहता।