शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २३२ )
जवानी, धनसम्पत्ति, प्रभुता और अज्ञानता,—इनमें से प्रत्येक अनर्थकारी है। जहाँ ये चारों एकत्र हों, वहाँकी तो बात ही न पृच्छिये।
क्षप्य ।
इन्द्रिन को हित-धाम, कामको मित्र महावर।
नरक-दुःखको हेतु, मोहको बीज मनोहर।
ज्ञान-सुधाकर-सीस, सजल सावनको बादर।
नाना विधि बक्वाद करन कों, बड़ो बहादुर।
सब ही अधको है मूल्य, यह यौवन अङ्गतहि को कवच ।
या विना और को कर सके, सुन्दर सुख पर श्याम कव ? ॥७०॥
सार—जवानी अनर्थोंकी जड़ है। अतः जवानीमें मनुष्यको खूब सावधानीसे चलना चाहिये।
70. In this world there is nothing more harmful than young age, which is the seat of affection, the root cause of the miseries of a hundred hells, the very seed for the growth of delusion, the clouds as it were for covering the moon of reasoning, the only friend of Kamdev, the doer of many kinds of vices and the destroyer of its own self.
—*—
गुंगारदुमनीरदे प्रचुरतः कीडारसखोतसि
प्रभुस्रपियवान्वये चतुरतासुत्ताफलोदनन्ति ॥