शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २३१ )
जब मनुष्य पर इक्षुका भूत सवार हो जाता है ; तब वह, झानी और पण्डित होने पर भी, अज्ञानी और मूर्ख हो जाता है ; उसे बुरे-भलेका विचार नहीं रहता । उसकी आँखोंके सामने उसका माशूक ही हरदम फिरता रहता है । वह अपने माशूक को प्राप्त करनेके लिये नाना प्रकारके उपाय करता है । यदि मनोकामना पूरी नहीं होती, तो वह कुपित होता है । क्रोधसे उसकी रहीं-सही बुद्धि भी मारी जाती है । बुद्धि के नष्ट होनेसे मनुष्य बिना पतवार की नावकी तरह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । अनेकों नौजवान इस प्रेम या इक्षु की बीमारीमें गिरफ्तार होकर जानसे मारे गये । अनेकोंके घर तबाह हो गये और अनेकों करोड़पति स्नाकपति हो गये । स्पष्ट है कि, अनुराग या मुहब्बत हज़ारों आफतोंकी जड़ है । अनुरागी इस जन्ममें खीका गुलाम होकर रहता है । वह कठपुतलीकी तरह उसे जो नाच नचाती है, वह वही नाच नाचता है । परमात्माको कभी भूल कर भी याद नहीं करता । मौतका खयाल न रहनेसे, नाना प्रकारके अत्याचार और जुल्म करता है । लेकिन यह अनुराग जवानीमें ही होता है ; इसीलिये कविने जवानीकी निन्दा की है । इसमें शक नहीं कि, जवानी अनेक प्रकारके अनर्थोंकी जड़ है ।
कहा है :—
यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ? ॥