भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २३० )

fore go home before old age takes away the beauty of my beloved lady whose eyes are like blossomed lotuses,

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रागस्यागारभेकं नरकशतमहादुःखसंप्राप्तिहेतु- मोहस्योत्पत्तिवीजं जलथरपटलं ज्ञानताराधिपस्य ॥ कन्दर्पस्यैकमित्रं प्रकटितविविधस्पष्टदोषप्रबन्धं लोकैऽस्मिन्बन्धनर्थनिजकुलदहनयौवनादन्यदस्ति ॥७०॥

अनुरागके घर, नरकके नाना प्रकारके दुःखोंके हेतु, मोहकी उत्पत्तिके बीज, ज्ञानरूपी चन्द्रमाके टकनेको मेघ-समूह, कामदेवके मुख्य मित्र, नाना दोषोंको स्पष्ट प्रकटानेवाले और अपने कुलको दहन करनेवाले—यौवनेके सिवा, इस लोकमें, दूसरा कोई अनर्थ नहीं है ॥७०॥

खुलासा—सारी आफूतोंका मूल—अनुराग, यौवनावस्थामें ही होता है। इस अवस्थामें ही मनुष्यको प्रेम या इश्वरकी बीमारी लगती है। उस्ताद जौक कहते हैं :—

इश्वरका जोश है जब तक, कि जवानीके हैं दिन । यह मर्ज करता है शिहत, इन्हीं अश्याय में खास ॥

प्रेमरूप व्याधिके उभरनेका खटका जवानीमें ही रहता है। ये दिन ही इस बीमारीके लिये खास हैं।