भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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धिकार है ! ऐसे विवाह और ऐसी औलादको ? ऐसी वर्णसंकर सन्तानसे वंशका नाम लेप हो जाना कहीं भला ।

कुरडलिया ।

नरवर ! तुष्णासिन्धुके, पार न कोई जाय ।

कहा अर्थ संचय किये, कालसर्प वय खाय ?।

कालसर्प वय खाय, नेह श्रुत श्रेम नसावै ।

कहा होय घर गये, तबै कछु हाथ न आवै ?।

तासों तबलों वेग, भाग चलिये द्वारे घर ।

कमलनयन तिय रूप, जरा जबलों नहि नरवर ॥६६॥

सार—कमलनयनी कामिनियोंके भोगने का समय युवावस्था ही है । जो पुरुष धन-तृष्णामे फँस, अपनी और अपनी पत्नी की जवानीका सुख नहीं भोगते, वे बड़े ही मूर्ख हैं । धन भी तो सुख-भोगोंके लिये ही कमाया जाता है ; जब सुख-भोग न भोगे, तब धन कमाना वृथा ही हुआ ।

69. O Sovereign, no one has been able to cross this ocean of desires ; and when this my young age full of affection is lost in itself, then what is the use of earning much wealth. I should there-