शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( २३१ )
जब मनुष्य पर इक्षुका भूत सवार हो जाता है ; तब वह, झानी और पण्डित होने पर भी, अज्ञानी और मूर्ख हो जाता है ; उसे बुरे-भलेका विचार नहीं रहता । उसकी आँखोंके सामने उसका माशूक ही हरदम फिरता रहता है । वह अपने माशूक को प्राप्त करनेके लिये नाना प्रकारके उपाय करता है । यदि मनोकामना पूरी नहीं होती, तो वह कुपित होता है । क्रोधसे उसकी रहीं-सही बुद्धि भी मारी जाती है । बुद्धि के नष्ट होनेसे मनुष्य बिना पतवार की नावकी तरह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । अनेकों नौजवान इस प्रेम या इक्षु की बीमारीमें गिरफ्तार होकर जानसे मारे गये । अनेकोंके घर तबाह हो गये और अनेकों करोड़पति स्नाकपति हो गये । स्पष्ट है कि, अनुराग या मुहब्बत हज़ारों आफतोंकी जड़ है । अनुरागी इस जन्ममें खीका गुलाम होकर रहता है । वह कठपुतलीकी तरह उसे जो नाच नचाती है, वह वही नाच नाचता है । परमात्माको कभी भूल कर भी याद नहीं करता । मौतका खयाल न रहनेसे, नाना प्रकारके अत्याचार और जुल्म करता है । लेकिन यह अनुराग जवानीमें ही होता है ; इसीलिये कविने जवानीकी निन्दा की है । इसमें शक नहीं कि, जवानी अनेक प्रकारके अनर्थोंकी जड़ है ।
कहा है :—
यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ? ॥
( २३२ )
जवानी, धनसम्पत्ति, प्रभुता और अज्ञानता,—इनमें से प्रत्येक अनर्थकारी है। जहाँ ये चारों एकत्र हों, वहाँकी तो बात ही न पृच्छिये।
क्षप्य ।
इन्द्रिन को हित-धाम, कामको मित्र महावर।
नरक-दुःखको हेतु, मोहको बीज मनोहर।
ज्ञान-सुधाकर-सीस, सजल सावनको बादर।
नाना विधि बक्वाद करन कों, बड़ो बहादुर।
सब ही अधको है मूल्य, यह यौवन अङ्गतहि को कवच ।
या विना और को कर सके, सुन्दर सुख पर श्याम कव ? ॥७०॥
सार—जवानी अनर्थोंकी जड़ है। अतः जवानीमें मनुष्यको खूब सावधानीसे चलना चाहिये।
70. In this world there is nothing more harmful than young age, which is the seat of affection, the root cause of the miseries of a hundred hells, the very seed for the growth of delusion, the clouds as it were for covering the moon of reasoning, the only friend of Kamdev, the doer of many kinds of vices and the destroyer of its own self.
—*—
गुंगारदुमनीरदे प्रचुरतः कीडारसखोतसि
प्रभुस्रपियवान्वये चतुरतासुत्ताफलोदनन्ति ॥
( २३३ )
तन्वीनेनचकोरपावैणविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यःकोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने ॥७१॥
शृंगार रूपी वृद्धोंके सौचनेवाले, क्रीड़ासको विस्तारसे प्रवाहित करनेवाले, कामदेवके प्यारे मित्र, चातुर्थ्यरूपी मोतियोंके समुद्र, कामिनियोंके नेत्ररूपी चकोरोंको पूर्णचन्द्र, सौभाग्य-लक्ष्मीके खजाने—यौवनको पाकर, जो विकारोंके वशीभूत नहीं होते, वे निश्चय ही भाग्यवान् हैं ॥७१॥
खुलासा—यौवन विषयवासनाओंको बढ़ाने वाला और भोग-चिलासका ज्वर्दस्त स्रोता है। यह स्त्रियोंको प्यारा लगनेवाला तथा चतुराई और सुख-सम्पत्तियोंकी खान है। जवानोंमें, मनुष्य की भोगचिलास की इच्छाएँ बहुत ही तेज हो जाती हैं ; इसलिए ये बड़ा ही नाज़ुक समय है। इस अवस्थामें, जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको वशमें रख सकता है, उन्हें कुमार्गमें जानेसे रोक सकता है, वह सबमुच ही भाग्यवान् है। धातुओंके क्षीण होने पर, बुढ़ापा आने पर, तो सभी शान्त हो जाते हैं ; पर इस जवानी दीवानोंमें ही जो शान्त रहे, स्त्रियोंके जालमें न फँसे, वही प्रशंसा-योग्य है। भीष्म पितामहने अपनी सारी उम्र बिना स्त्रीके ही बिता दी ; जीवन-भर ब्रह्मवर्ष-व्रत पालन किया। यदि वे चाहते तो अनेक स्वर्गकी अप्सरायें उनके चरणोंको धो-धोकर पीतीं। पर यदि वे ऐसा करते, तो महाशक्तिशालियोंमें उनकी गणना न होती और संसार उन्हें धर्मधुरीण शूरशिरसोमणि न कहता।

( १४ ) बुढ़ापा आने पर सुन्दरी कामिनी की भी दुर्दशा हो जाती है ।
( २३५ )
दृष्ट्वा मायति मोदतेऽभिरमते प्रस्तौति जाननपि प्रत्यज्ञाशुचिपुत्तिकां स्त्रियमहो मोहस्य दुश्चेष्टितम् ॥७२॥
अहो ! मोहकी कैसी विचित्र महिमा है कि, बड़े-बड़े विद्वान् पण्डित भी, प्रत्यज्ञा ही अपवित्रताकी पुतली—लौको देखकर मोहित हो जाते हैं , उसकी स्तुति करते हैं, आनन्दित होते हैं, रमण करते हैं और उत्कण्ठित होकर हे कमलनयनी ! हे विशाल नितम्बोवाली ! हे विशालाक्षी ! हे कल्याणि ! हे शुभे ! हे पुष्टपोधरवाली ! हे सुन्दर भौहोवाली प्रभृति नाना प्रकारके सम्बोधनोसे उसे सम्बोधित करते हैं ॥७२॥
खुलासा—खी हर तरहसे अपवित्र और गन्दगी का पिटाशा है । उसके स्तन मांसके लौदे हैं, उसका मुँह कफका आगार है, उसकी जाँघें मूत्रसे अपवित्र रहती हैं और उसके मल-मूत्र त्यागने के स्थानों में दो-अंगुलका भी अन्तर नहीं—ऐसी स्त्रीकी, साधारण नहीं, बड़े-बड़े विद्वान् और पण्डित खुशामद करते हैं, उसे अच्छे-से-अच्छे नामोंसे सम्बोधन करते हैं, यह क्या मोहकी महिमा नहीं है ? मोह उनकी विद्या-बुद्धि और ज्ञानको नष्ट कर देता है, इसीसे वे अपवित्रता की पुतलीको संसारके सभी पदार्थों से अधिक चाहते और प्यार करते हैं । निश्चय ही, मोहने जगत् को अन्ध कर रक्खा है । देखिये, विद्वानोंने स्त्रियोंकी कैसी तारीफें की हैं :—
( २३६ )
स्त्रियोंकी तारीफोंके नमूने ।
—○○—
संस्कृत कवियोंकी उक्तियाँ ।
सुविरलमौक्तिकतारे धवलशुक्लचन्द्रिकाचमत्कारे ।
वदनपरिपूर्णाचन्द्रे सुन्दरि राकाऽसिनात्र सन्देहः ॥
हे सुन्दरि ! तेरे हारके मोती तारोंकी तरह खिल रहे हैं । तेरे सफेद वस्त्र चाँदनीका चमत्कार दिखा रहे हैं और तेरा मुख पूर्णमासीके चन्द्रमाकी तरह शोभायमान है ; अतः तू निश्चय ही पौर्णिमा है ।
श्यामलेनांकितं बाले भाले केनापि लक्ष्मणा ।
मुण्वं तवांतरासुसमृद्धाऽकुलंखुजायते ॥ १ ॥
हे बाले ! तेरी पेशानी या मस्तक में जो एक काला-काला चिह्ना है, उससे तेरा चेहरा ऐसा मालूम होता है, गोया खिले हुए कमलके बीचमें भौरा सो रहा हो ।
स्मयमाननानां तत्र तां विलोक्य विलासिनीम् ।
चकोराश्चंचरीकाश्च मुदे परतरां ययुः ॥ २ ॥
उस मन्द-मन्द मुस्करानेवाली नायिका को देखकर चक्रों और भौरोंको खूब आनन्द आया ; यानी चकोर उसे चन्द्रमा समझ कर खुश हुए और भौरै कमल समझ कर ।
( २३७ )
दिवानिशं वारिणि कण्ठद्वन्ने दिवाकराराधनामार्चन्ती ।
वद्गोजतायै किमु पद्मलाह्यास्तपश्चरत्यंबुजपंक्तिरप्रा ॥ ३ ॥
जलमें कण्ठ तक रहकर, दिन रात सूर्यकी आराधना करने वाली, यह कमलोंकी कृत्तार क्या सुनयनी नायिकाके कुछ बननेके लिये तप कर रही है ?
आननं भृगशावाह्या वीक्ष्य लोलालकाहृतम् ।
भ्रमद्भ्रमरसम्भारं स्मरामि सरोरुहम् ॥ ४ ॥
हिरनके बच्चेकी सी आँखोंवाली सुन्दरीके मुँहको चञ्चल अलकोंसे ढका हुआ देखनेसे मुझे ऐसा मालूम होता है, गोया कमलके ऊपर भौरोंका झुण्ड घूम रहा है ।
जगदन्तरमभुतभयैर्यशुभिराप्रयन्त्रितराम् ।
उदयति वदनव्याजात् किमु राजा हरिणशावनयनायाः ॥५॥
भृगशावकनयनीके चेहरेके बहानेसे संसार को अपनी अमृत-मय किरणोंसे भर देनेके लिये, क्या चन्द्रमा उदय हुआ है ?
तिमिरं शारदं चन्द्रिं चन्द्रिकाः कमलविटुम चम्पककोरकाः ।
यदि मिलकति तदापि तदाननं खलु तदा कलया तुल्यामहे ॥६॥
घोर अन्धकार, शरदका चन्द्रमा, चाँदनी, कमल, मूँगगा और चम्पाकली,— ये सब अगर किसी समय एकही पदार्थमें इकट्ठे पाये जायें, तो मैं उस नायिकाके चेहरेके एक अंशकी तुलना कर सकूँ ; यानी घोर अन्धकारसे उसके काले-स्याह बालोंकी, शरद
( २३८ )
के चाँदसे उसके मुखकी, चाँदनीसे ठावण्यकी, कमलसे नेत्रोंकी, प्रवालसे होठोंकी और चम्पाकी कलियोंसे दाँतोंकी तुलना करू ।
उर्दू कवियोंकी मनोहर उक्तियाँ ।
कोई खियोंके दाँतोंकी तारीफ़ करता है, तो कोई उसके होठोंकी प्रशंसामें कविता रचता है, और कोई उसके गालके तिल पर ही अपनी शायरीका खातमा करता है । उर्दू-कवियोंकी तारीफ़ोंके नमूने भी देखिये :—
दाँत तूँ चमके हँसीमें रात उस माहपारिके ।
मैंने जाना, माहतावों पारा-पारा हो गया ॥१॥
अरुणके कतरे, नहीं देखते हैं उस खूब पर ।
सितारे धूपमें, हम देापहरको देखते हैं ॥२॥
बहरमें मोती पानी पानी, लाल का तूँ पत्थर में ।
देखो, लबो दन्दोंसे, तुम्हारे लालो गुहरेके मगड़े हैं ॥३॥
न क्यों तेरे दाँतोंसे, फूँटा हो जाती ।
कि दावा किया था, सफ़ाईका फूटा ॥४॥
वह चन्द्रमुखी रातको जो हँसी, तो उसकी दाँतों की क़तर की चमकसे मुके ऐसा मालूम हुआ ; गोया चन्द्रमाके टुकड़े-टुकड़े हो गये ॥१॥
माहतावों=चाँद । माहपारा=चन्द्रबदनी । पारा पारा हो गया=टुकड़े-टुकड़े हो गया । अरुण=ब्राह्म । खूब=गाल । क़तरा=बूँद । बहर=अमुद । खब=होठ ।
( २३६ )
उसके गाल पर पसीनेकी बूँदें नहीं हैं, वे तो द्रोणहरके समय धूपमें तारे दिखाई दे रहे हैं ॥२॥
तेरे दाँतों की आभाको देखकर, समन्दरमें मोती शर्मके मारे पानी-पानी हो रहा है और तेरे ओठों की सुखीको देखकर लाल-का दिल पहाड़ की गुफामें स्पन्दकिके मारे खून हो गया है । देख तो सही, तेरे दाँत और होठोंके कारण, मोती और लालों की कौसी बुरी दशा हो रही है ॥३॥
मोतीने तेरे दाँतोंसे सफाईमें बढ जानेका दावा किया था ; मगर वह तेरे दाँतोंके मुकाबलेमें झूठा निकला ॥४॥
एक हिन्दी कवि की भी फाब्यकला-कुशलताका नमूना देखिये :—
गोरे मुख पर तिल लसत, ताहि करूँ प्रणाम ।
मानो चन्द्र विद्याय कर, पौड़े शालग्राम ॥
गोरे मुँह पर जो तिल शोभायमान है, उसमें प्रणाम करता हूँ ; क्योंकि मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमाको बिछाकर शालग्राम सो रहे हों ।
मिथ्या नज़ीर अकबराबादीकी तारीफ़ोंके भी चन्द्र नमूने देखिये :—
छोटासा खाल, उस खूब खुशोद ताब में ।
ज़रा समा गया है, दिले भापताबमें ॥
( २४० )
उस सूर्यकी भाँति चमकनेवाले मुख पर छोटासा तिल देखने में ऐसा मालूम होता है, जैसे सूर्यमें एक छोटा सा कण ।
सहर इस क्षमकत्ते आया, नज़र एक निगार राना ।
कि खुद उसके हुस्ने खूबको, लगा तकने जुरा आसा ॥
सवेरे ही मुझे एक सुन्दर प्रतिमा दिखाई दी कि, मैं सूर्य-कण की भाँति उसके मुखारविन्द की शोभाको देखने लगा ; यानी सूर्य उसके सामने कण की तरह था ।
बुतोंकी मजलिसमें शबको माहूर,
जो और टुक भी क्याम करता ।
कनिश्त वीरों सनमको बन्दा,
ब्रह्मनोको गुलाम करता ॥
अगर वह चन्द्रमुखी मूर्तियों की सभामें रातको जरा देर और ठहर जाती, तो मन्दिर उजड़ जाते, मूर्तियाँ उसकी गुलाम हो जातीं और ब्राह्मण—पुजारी उसके सेवक हो जाते । उसके सौन्दर्य पर देवता और मनुष्य दोनों मोहित हो जाते हैं ।
सफाई उसकी भलकली है, गोरे सीनेमें ।
चमक कहाँ है, य अलमासके नगीनेमें ॥
उसके गोरे सीनेमें जो सफाई और चमक-दमक भलक रही है, अलमासके नगीनेमें वह चमक कहाँ है ?
( २४१ )
नहीं हवामें य वृ नाफए ुखुतनकी सी ।
लपट है य तो, किसी जुल्के पुरशिकनकीसी ॥
हवामें जो महक आ रही है, यह ुखुतन देशकी कस्तूरीकी नहीं है । मुझे तो यह उसकी घूँघर वाली लट्ठोंकी महक सी मालूम होती है ।
महाकवि गालिबके भी चन्द नमूने देखिये :—
जहाँ तेरा नकशे कदम देखते हैं ।
ख़याबों ख़याबों इरम देखते हैं ॥
जहाँ हमें तेरा चरण-चिह्न दिखाई देता है, उसी स्थानको हम स्वर्गसे बढ़कर समझते हैं ।
महाकवि दाग का भी एक नमूना लीजिये :—
बुभू गया गुलरूके आगे, शमा और गुलका चिराम् ।
बुलबुलोंमें शोर, परवानोंमें मातम हो गया ॥
उसके सुन्दर मुखके आगे दीपक और फूल दोनोंकी प्रभा फीकी पड़ गई । तभी तो बुलबुले शोर कर रही हैं और परवाने (पनङ्ग) शोक मना रहे हैं ।
कहाँ तक लिखें, विद्वानोंने स्त्रियोंकी तारीफ़ में पोथे-के-पोथे लिख डाले हैं ।
अपदेशक की सलाह ।
अगर कोई ज्ञानी पुरुष इन स्त्री-दासोंको नसोहत देता है, उनको स्त्रियोंकी प्रीतिका नफ़ा-नुकसान समझता है, तो ये
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( २४२ )
चिढ़ते और उसे खोटी-खरी सुनाते हैं। अगर कोई कहता है— मैया ! यह राह—प्रेमकी राह—बड़ी खराब है। इसमें बड़ी तक- लीफें हैं। महाकवि दागने कहा है :—
पुरी है ऐ दागू राहे उल्लत । खुदा न ले जाय ऐसे रास्ते । जो अपनी तुम सैर चाहते हो । तो भूलकर दिरलगी न करना ।
ऐ दागू ! प्रेमकी राह पुरी है। भगवान् इस राहसे किसी को न ले जाय। जो तुम अपना भला चाहते हो, तो भूलकर भी इस राह पर कदम न रखना।
उस्ताद ज़ौकने भी कहा है :—
मालूम जो होता अन्जामे सुहृवत । लेते न कभी भूलके हम नामे सुहृवत ॥
अगर मुझे प्रेमका नतीजा मालूम होता, तो मैं कभी भूलके भी प्रेमका नाम न लेता।
भाई ! प्रेमका नाम लेना सहज है, पर प्रेम करना कठिन है। भाँग खाना सहज है, पर उसकी लहरें सहना मुश्किल है। इस राहमें मजन्तूर और फ़रहाद की जो दुर्दशा हुई, वह क्या तुम्हें नहीं मालूम ? इसमें जान तकके लाले पड़ जाते हैं। इन बातोंको सुन कर स्त्री-दास फ़रमाते हैं :—
( २४३ )
स्त्री-दामका जवाब ।
मर गये तो मर गये, हम इश्कमें नासह को क्या । मौत आनेके लिये है, जान जानेके लिये ॥
जिसने दिल खोया, उसी को कुछ मिला । फायदा देखा, इसी नुकसान में ॥
हम इश्कमें मर गये तो मर गये, उपदेशक महाशयकी क्या हानि ? मौत आनेको है और जान जानेको है । जिसने किसीको दिल दिया, उसे ही कुछ मिला । हमने तो इसी हानिमें लाभ देखा ।
उपदेशकजी ! प्रेममय जीवन ही जीवन है । जिसमें प्रेम नहीं, उसका जीवन सारशून्य—थोथा है । गुलाबमें कटि है, पर क्या काँटोंके भयसे लोग गुलाबको छोड़ सकते हैं ? चन्दनके वृक्षोंपर सर्प लिपटे रहते हैं, तो क्या सर्पोंके भयसे कोई चन्दनको ग्रहण नहीं करता ? मनुके छत्ते पर विपैली मनु-मक्खियाँ छाई रहती हैं, तो क्या कोई मनुका छत्ता तोड़ कर मनु नहीं लेता ? हज़ार दुःख-कष्ट भेटने पड़े, मैं भेटूँगा ; क्यों कि मुझे अपनी माशूका बिना नहीं सर सकता । किसीने कहा है :—
हैं तेरी राहें मुहच्यत में, हज़ारों फितने । देख मुझको, वजुज इस राहके चलता ही नहीं ॥
( २४४ )
देखिये मिष्टर शिलर महोदय कहते हैं—“I have experienced earthly happiness ; I have lived and I have loved.” मैंने पार्थिव जीवनका अनुभव किया है । मैंने जीवनोपयोग किया है और प्रेम भी किया है ।
होल्टी महोदय कहते हैं—“Love converts the cottage into a palace of gold.” प्रेम भोपड़ेको सुवर्णमय महलमें परिणत कर देता है ।
कोरनर महोदय कहते हैं—“Only since I loved is life lovely ; only since I loved knew I that I loved.” जबसे मैंने प्रेम किया, तभीसे मैंने अनुभव किया कि, मैं जीवित हूँ ।
कहिये पाठक ! विद्वानोंके ये जवाब सुनकर आपका दिल भरा या नहीं ? जब विद्वानोंका यह हाल है, तब मूर्खोंका क्या कहना ? उनको दोषी ठहराना अन्याय है । जब शास्त्र-ज्ञाता पण्डित ही इन मोहिनियोंके जालोंमें फँस जाते हैं, तब और इनसे कौन बच सकता है ? कहा है—
मनुष्य दुर्लभ प्राप्य वेदशास्त्रायधीत्य च ।
वध्यते यदि संसारे को विमुच्यते मानवः ॥
दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर और वेदशास्त्र पढ़कर भी यदि मनुष्य संसार-बन्धनमें बँध जावे, तो संसार-बन्धनसे कौन छूटेगा ?
( २४५ )
और भी—
पाठकाः पठितारश्च ये चान्ये शास्त्रचित्तकाः ।
सर्वेव्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान्सपण्डितः ॥
जो शास्त्र पढ़ने और पढ़ानेवाले केवल शास्त्रोंको विचारते हैं, पर उन पर अमल नहीं करते, वे मूर्ख और व्यसनी हैं। जो उनको पढ़ कर स्त्री-पुत्र और धन-दौलत प्रभृतिसे विरक्त होते हैं, वही पण्डित हैं।
स्त्रियां जगत् की भूँटन, नरक-कूप, महागन्दी और अपवित्र हैं। इनके भीतर राघ लोह पीप और खवार प्रभृतिके पनारे बह रहे हैं। यह गुप्सद की कुलई की तरह ऊपर हीसे सोहनी मालूम होती हैं। देखिये, गिरिधर कविराय क्या कहते हैं :—
कुण्डलिया ।
नारी थोणी नरककी, है प्रसिद्ध नहीं लुकी ।
यथा सभान परकीया, तथा जान ले स्वकी ॥
तथा जान ले स्वकी, तीनको एक रूपम् ।
धस्थ मांस नख चर्म, रोम मल मूर्त्रहि रूपम् ॥
कह गिरिधर कविराय, पुरुष इन कियो अजारी ।
ऐसा दुष्ट न और, जगत्में जैसी नारी ॥
( २४६ )
कुण्डलिया ।
कान्ता उत्पल-लोचना, प्रिया क्रशोदरि बाल ।
घटस्तनी पंकजमुखी, कामिनि-अधर प्रवाल ॥
कामिनि-अधर प्रवाल, सुभु कहि-कहिके बोले ।
आनंद अधिक उद्वाह, मत्त बन परिणत डोले ॥
अशुचि-पूतरी नारि, ताहि मन जाने शान्ता ।
महा नरककी खान, मोह-बस मानै कान्ता ॥७२॥
अपनी और पराई रूपवती और कुरुपा सभी नारियाँ मलमूत्रकी खान और नरकद्वार की कुञ्जी हैं ; पर मोहान्ध होनेसे परिणतों और विचारवानोंको भी यह असली बात समझ नहीं पड़ती । इसीसे वे इन की प्रशंसाके पुल बाँधते हैं ।
72. How wonderful is the action of delusion because people at the sight of the woman who is impurity personified eagerly describe her thus.—“How beautiful is she”, “she is lotus-eyed”, “her hips are very big in size”, “her breasts are high and full-grown” “her lotus-like face is very handsome and her brows are very fascinating” at her sight they are charmed, become infatuated, constantly remember her and praise her.
—*—
( २४७ )
स्मृता भवति तापाय दृष्टा चोन्मादवर्द्धिनी ।
स्पृष्टा भवति मोहाय सा नाम दयिता कथम् ॥७३॥
जो स्त्री स्मरणमात्र करनेसे सन्ताप करती है, देखते ही उन्माद बढ़ाती है और छूते ही मोह उत्पन्न करती है, उसेन जाने क्यों प्राणप्यारी कहते हैं ॥७३॥
खुलासा—जिसके खाली याद आनेसे ही मनमें वेदना सी होने लगती है, जिसके देखनेसे मनुष्य मतवाला और पागल सा हो जाता है और जिसके छूनेसे ही विवेक और ज्ञानका नाश होकर, मोहकी बढ़ती होती है, ऐसी कदम-कदम पर दुःख देने-वाली स्त्रीको लोग प्यारी, प्राणप्यारी, प्रिया, कल्याणी, प्राणाधिका प्रभृति क्यों कहते हैं, यह बात समझमें नहीं आती ?
वास्तवमें स्त्री दुःख और आपदाओंकी खान है, पर लोगोंको यह बात मालूम नहीं होती । वजह यह है कि, हिम्रोटाइज़ करने वालोंकी तरह, स्त्री नज़र-से-नज़र मिलते ही, अपनी जादूमरी आँखोंसे, मदिरा की तरह, मोह पैदा कर देती है । उस मोहसे मनुष्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है । ज्ञान नष्ट हो जानेसे उसे कुछ-का-कुछ दीखने लगता है । जिस तरह मोहान्ध पुरुष अभक्ष्यको भक्ष्य, अकार्यको कार्य और दुर्गमको सुगम समझने लगता है ; उसी तरह, साक्षात् विष होने पर भी, मोहान्धको स्त्री विषसी न दीखकर अमृतसी दीखती है । अमृतसी दीखनेकी वजहसे ही कामान्ध पुरुष उसे “प्राणप्यारी” कहते हैं ।
( २४८ )
दोहा ।
सुधि आये सुधि-डुधि हरत, दरसन करत अचेत ।
परसत मन मोहित करत, यह प्यारी किहि हेत ॥७२॥
73. How can we call a woman "beloved" whose recollection even gives pain, whose very sight increases intoxication of mind and whose touch creates a great sensation in us.
—*
तावेदेवामृतभयी यावलोचनगोवरा ।
चतुः पथाद्भगता विपाद्ध्यतिरिच्यते ॥७४॥
स्त्री जब तब आँखोंके सामने रहती है, तबतक अमृतसी मालूम होती है ; किन्तु आँखोंकी ओट होते ही, विषसे भी अधिक दुःखदायिनी हो जाती है ॥७४॥
खुलासा—स्त्री पुरुषके पास होनेसे निश्चय ही अमृत सी मालूम होती है ; क्योंकि वह अपने हाव-भाव, कटाक्ष और मधुर वचन तथा सेवा प्रभृतिसे पतिके चित्तको हार्यमें लिये रहती है ; पर अलग होते ही मनमें भारी विरह-वेदना करती है । वियोग-विकल पुरुषका खाना-पीना और नियमित समय पर सोना प्रभृति छूट जाता और साथ ही स्वास्थ्य तक नष्ट हो जाता है । स्त्रीका विरह पुरुषके शरीर पर जहरका काम करता है । उसके मर्ममें घोर सन्ताप होता है । इसीसे कहा है कि, स्त्री आँखोंके सामनेसे हटते ही विषवत् हो जाती है ।
श्रीमान्
रबी जन्म तक आर्यों के मानने रहती है, अस्सल मी मायूस होती है : आर्यों की छोट होने ही शिव ने भी अधिक दुखहायिनी हो जाती है। इन चित्रमें ऊपर पुरन कोंक मानने देटा हुआ नृत्य-मुद्रा पान कर रहा है, किन्तु नीचे जराडे में दुर्गा है यही भाव कियेया है।
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