भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २४३ )

स्त्री-दामका जवाब ।

मर गये तो मर गये, हम इश्कमें नासह को क्या । मौत आनेके लिये है, जान जानेके लिये ॥

जिसने दिल खोया, उसी को कुछ मिला । फायदा देखा, इसी नुकसान में ॥

हम इश्कमें मर गये तो मर गये, उपदेशक महाशयकी क्या हानि ? मौत आनेको है और जान जानेको है । जिसने किसीको दिल दिया, उसे ही कुछ मिला । हमने तो इसी हानिमें लाभ देखा ।

उपदेशकजी ! प्रेममय जीवन ही जीवन है । जिसमें प्रेम नहीं, उसका जीवन सारशून्य—थोथा है । गुलाबमें कटि है, पर क्या काँटोंके भयसे लोग गुलाबको छोड़ सकते हैं ? चन्दनके वृक्षोंपर सर्प लिपटे रहते हैं, तो क्या सर्पोंके भयसे कोई चन्दनको ग्रहण नहीं करता ? मनुके छत्ते पर विपैली मनु-मक्खियाँ छाई रहती हैं, तो क्या कोई मनुका छत्ता तोड़ कर मनु नहीं लेता ? हज़ार दुःख-कष्ट भेटने पड़े, मैं भेटूँगा ; क्यों कि मुझे अपनी माशूका बिना नहीं सर सकता । किसीने कहा है :—

हैं तेरी राहें मुहच्यत में, हज़ारों फितने । देख मुझको, वजुज इस राहके चलता ही नहीं ॥