शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४४ )
देखिये मिष्टर शिलर महोदय कहते हैं—“I have experienced earthly happiness ; I have lived and I have loved.” मैंने पार्थिव जीवनका अनुभव किया है । मैंने जीवनोपयोग किया है और प्रेम भी किया है ।
होल्टी महोदय कहते हैं—“Love converts the cottage into a palace of gold.” प्रेम भोपड़ेको सुवर्णमय महलमें परिणत कर देता है ।
कोरनर महोदय कहते हैं—“Only since I loved is life lovely ; only since I loved knew I that I loved.” जबसे मैंने प्रेम किया, तभीसे मैंने अनुभव किया कि, मैं जीवित हूँ ।
कहिये पाठक ! विद्वानोंके ये जवाब सुनकर आपका दिल भरा या नहीं ? जब विद्वानोंका यह हाल है, तब मूर्खोंका क्या कहना ? उनको दोषी ठहराना अन्याय है । जब शास्त्र-ज्ञाता पण्डित ही इन मोहिनियोंके जालोंमें फँस जाते हैं, तब और इनसे कौन बच सकता है ? कहा है—
मनुष्य दुर्लभ प्राप्य वेदशास्त्रायधीत्य च ।
वध्यते यदि संसारे को विमुच्यते मानवः ॥
दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर और वेदशास्त्र पढ़कर भी यदि मनुष्य संसार-बन्धनमें बँध जावे, तो संसार-बन्धनसे कौन छूटेगा ?