भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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और भी—

पाठकाः पठितारश्च ये चान्ये शास्त्रचित्तकाः ।

सर्वेव्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान्सपण्डितः ॥

जो शास्त्र पढ़ने और पढ़ानेवाले केवल शास्त्रोंको विचारते हैं, पर उन पर अमल नहीं करते, वे मूर्ख और व्यसनी हैं। जो उनको पढ़ कर स्त्री-पुत्र और धन-दौलत प्रभृतिसे विरक्त होते हैं, वही पण्डित हैं।

स्त्रियां जगत् की भूँटन, नरक-कूप, महागन्दी और अपवित्र हैं। इनके भीतर राघ लोह पीप और खवार प्रभृतिके पनारे बह रहे हैं। यह गुप्सद की कुलई की तरह ऊपर हीसे सोहनी मालूम होती हैं। देखिये, गिरिधर कविराय क्या कहते हैं :—

कुण्डलिया ।

नारी थोणी नरककी, है प्रसिद्ध नहीं लुकी ।

यथा सभान परकीया, तथा जान ले स्वकी ॥

तथा जान ले स्वकी, तीनको एक रूपम् ।

धस्थ मांस नख चर्म, रोम मल मूर्त्रहि रूपम् ॥

कह गिरिधर कविराय, पुरुष इन कियो अजारी ।

ऐसा दुष्ट न और, जगत्में जैसी नारी ॥