भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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चिढ़ते और उसे खोटी-खरी सुनाते हैं। अगर कोई कहता है— मैया ! यह राह—प्रेमकी राह—बड़ी खराब है। इसमें बड़ी तक- लीफें हैं। महाकवि दागने कहा है :—

पुरी है ऐ दागू राहे उल्लत । खुदा न ले जाय ऐसे रास्ते । जो अपनी तुम सैर चाहते हो । तो भूलकर दिरलगी न करना ।

ऐ दागू ! प्रेमकी राह पुरी है। भगवान् इस राहसे किसी को न ले जाय। जो तुम अपना भला चाहते हो, तो भूलकर भी इस राह पर कदम न रखना।

उस्ताद ज़ौकने भी कहा है :—

मालूम जो होता अन्जामे सुहृवत । लेते न कभी भूलके हम नामे सुहृवत ॥

अगर मुझे प्रेमका नतीजा मालूम होता, तो मैं कभी भूलके भी प्रेमका नाम न लेता।

भाई ! प्रेमका नाम लेना सहज है, पर प्रेम करना कठिन है। भाँग खाना सहज है, पर उसकी लहरें सहना मुश्किल है। इस राहमें मजन्तूर और फ़रहाद की जो दुर्दशा हुई, वह क्या तुम्हें नहीं मालूम ? इसमें जान तकके लाले पड़ जाते हैं। इन बातोंको सुन कर स्त्री-दास फ़रमाते हैं :—

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