भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २४१ )

नहीं हवामें य वृ नाफए ुखुतनकी सी ।

लपट है य तो, किसी जुल्के पुरशिकनकीसी ॥

हवामें जो महक आ रही है, यह ुखुतन देशकी कस्तूरीकी नहीं है । मुझे तो यह उसकी घूँघर वाली लट्ठोंकी महक सी मालूम होती है ।

महाकवि गालिबके भी चन्द नमूने देखिये :—

जहाँ तेरा नकशे कदम देखते हैं ।

ख़याबों ख़याबों इरम देखते हैं ॥

जहाँ हमें तेरा चरण-चिह्न दिखाई देता है, उसी स्थानको हम स्वर्गसे बढ़कर समझते हैं ।

महाकवि दाग का भी एक नमूना लीजिये :—

बुभू गया गुलरूके आगे, शमा और गुलका चिराम् ।

बुलबुलोंमें शोर, परवानोंमें मातम हो गया ॥

उसके सुन्दर मुखके आगे दीपक और फूल दोनोंकी प्रभा फीकी पड़ गई । तभी तो बुलबुले शोर कर रही हैं और परवाने (पनङ्ग) शोक मना रहे हैं ।

कहाँ तक लिखें, विद्वानोंने स्त्रियोंकी तारीफ़ में पोथे-के-पोथे लिख डाले हैं ।

अपदेशक की सलाह ।

अगर कोई ज्ञानी पुरुष इन स्त्री-दासोंको नसोहत देता है, उनको स्त्रियोंकी प्रीतिका नफ़ा-नुकसान समझता है, तो ये

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