शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४१ )
नहीं हवामें य वृ नाफए ुखुतनकी सी ।
लपट है य तो, किसी जुल्के पुरशिकनकीसी ॥
हवामें जो महक आ रही है, यह ुखुतन देशकी कस्तूरीकी नहीं है । मुझे तो यह उसकी घूँघर वाली लट्ठोंकी महक सी मालूम होती है ।
महाकवि गालिबके भी चन्द नमूने देखिये :—
जहाँ तेरा नकशे कदम देखते हैं ।
ख़याबों ख़याबों इरम देखते हैं ॥
जहाँ हमें तेरा चरण-चिह्न दिखाई देता है, उसी स्थानको हम स्वर्गसे बढ़कर समझते हैं ।
महाकवि दाग का भी एक नमूना लीजिये :—
बुभू गया गुलरूके आगे, शमा और गुलका चिराम् ।
बुलबुलोंमें शोर, परवानोंमें मातम हो गया ॥
उसके सुन्दर मुखके आगे दीपक और फूल दोनोंकी प्रभा फीकी पड़ गई । तभी तो बुलबुले शोर कर रही हैं और परवाने (पनङ्ग) शोक मना रहे हैं ।
कहाँ तक लिखें, विद्वानोंने स्त्रियोंकी तारीफ़ में पोथे-के-पोथे लिख डाले हैं ।
अपदेशक की सलाह ।
अगर कोई ज्ञानी पुरुष इन स्त्री-दासोंको नसोहत देता है, उनको स्त्रियोंकी प्रीतिका नफ़ा-नुकसान समझता है, तो ये
१६