शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४० )
उस सूर्यकी भाँति चमकनेवाले मुख पर छोटासा तिल देखने में ऐसा मालूम होता है, जैसे सूर्यमें एक छोटा सा कण ।
सहर इस क्षमकत्ते आया, नज़र एक निगार राना ।
कि खुद उसके हुस्ने खूबको, लगा तकने जुरा आसा ॥
सवेरे ही मुझे एक सुन्दर प्रतिमा दिखाई दी कि, मैं सूर्य-कण की भाँति उसके मुखारविन्द की शोभाको देखने लगा ; यानी सूर्य उसके सामने कण की तरह था ।
बुतोंकी मजलिसमें शबको माहूर,
जो और टुक भी क्याम करता ।
कनिश्त वीरों सनमको बन्दा,
ब्रह्मनोको गुलाम करता ॥
अगर वह चन्द्रमुखी मूर्तियों की सभामें रातको जरा देर और ठहर जाती, तो मन्दिर उजड़ जाते, मूर्तियाँ उसकी गुलाम हो जातीं और ब्राह्मण—पुजारी उसके सेवक हो जाते । उसके सौन्दर्य पर देवता और मनुष्य दोनों मोहित हो जाते हैं ।
सफाई उसकी भलकली है, गोरे सीनेमें ।
चमक कहाँ है, य अलमासके नगीनेमें ॥
उसके गोरे सीनेमें जो सफाई और चमक-दमक भलक रही है, अलमासके नगीनेमें वह चमक कहाँ है ?