शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २३६ )
उसके गाल पर पसीनेकी बूँदें नहीं हैं, वे तो द्रोणहरके समय धूपमें तारे दिखाई दे रहे हैं ॥२॥
तेरे दाँतों की आभाको देखकर, समन्दरमें मोती शर्मके मारे पानी-पानी हो रहा है और तेरे ओठों की सुखीको देखकर लाल-का दिल पहाड़ की गुफामें स्पन्दकिके मारे खून हो गया है । देख तो सही, तेरे दाँत और होठोंके कारण, मोती और लालों की कौसी बुरी दशा हो रही है ॥३॥
मोतीने तेरे दाँतोंसे सफाईमें बढ जानेका दावा किया था ; मगर वह तेरे दाँतोंके मुकाबलेमें झूठा निकला ॥४॥
एक हिन्दी कवि की भी फाब्यकला-कुशलताका नमूना देखिये :—
गोरे मुख पर तिल लसत, ताहि करूँ प्रणाम ।
मानो चन्द्र विद्याय कर, पौड़े शालग्राम ॥
गोरे मुँह पर जो तिल शोभायमान है, उसमें प्रणाम करता हूँ ; क्योंकि मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमाको बिछाकर शालग्राम सो रहे हों ।
मिथ्या नज़ीर अकबराबादीकी तारीफ़ोंके भी चन्द्र नमूने देखिये :—
छोटासा खाल, उस खूब खुशोद ताब में ।
ज़रा समा गया है, दिले भापताबमें ॥