भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 283

( २३८ )

के चाँदसे उसके मुखकी, चाँदनीसे ठावण्यकी, कमलसे नेत्रोंकी, प्रवालसे होठोंकी और चम्पाकी कलियोंसे दाँतोंकी तुलना करू ।

उर्दू कवियोंकी मनोहर उक्तियाँ ।

कोई खियोंके दाँतोंकी तारीफ़ करता है, तो कोई उसके होठोंकी प्रशंसामें कविता रचता है, और कोई उसके गालके तिल पर ही अपनी शायरीका खातमा करता है । उर्दू-कवियोंकी तारीफ़ोंके नमूने भी देखिये :—

दाँत तूँ चमके हँसीमें रात उस माहपारिके ।

मैंने जाना, माहतावों पारा-पारा हो गया ॥१॥

अरुणके कतरे, नहीं देखते हैं उस खूब पर ।

सितारे धूपमें, हम देापहरको देखते हैं ॥२॥

बहरमें मोती पानी पानी, लाल का तूँ पत्थर में ।

देखो, लबो दन्दोंसे, तुम्हारे लालो गुहरेके मगड़े हैं ॥३॥

न क्यों तेरे दाँतोंसे, फूँटा हो जाती ।

कि दावा किया था, सफ़ाईका फूटा ॥४॥

वह चन्द्रमुखी रातको जो हँसी, तो उसकी दाँतों की क़तर की चमकसे मुके ऐसा मालूम हुआ ; गोया चन्द्रमाके टुकड़े-टुकड़े हो गये ॥१॥

माहतावों=चाँद । माहपारा=चन्द्रबदनी । पारा पारा हो गया=टुकड़े-टुकड़े हो गया । अरुण=ब्राह्म । खूब=गाल । क़तरा=बूँद । बहर=अमुद । खब=होठ ।

शृंगार शतक · पृष्ठ 283, कुल 544 में से · BharatKosha