शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २३८ )
के चाँदसे उसके मुखकी, चाँदनीसे ठावण्यकी, कमलसे नेत्रोंकी, प्रवालसे होठोंकी और चम्पाकी कलियोंसे दाँतोंकी तुलना करू ।
उर्दू कवियोंकी मनोहर उक्तियाँ ।
कोई खियोंके दाँतोंकी तारीफ़ करता है, तो कोई उसके होठोंकी प्रशंसामें कविता रचता है, और कोई उसके गालके तिल पर ही अपनी शायरीका खातमा करता है । उर्दू-कवियोंकी तारीफ़ोंके नमूने भी देखिये :—
दाँत तूँ चमके हँसीमें रात उस माहपारिके ।
मैंने जाना, माहतावों पारा-पारा हो गया ॥१॥
अरुणके कतरे, नहीं देखते हैं उस खूब पर ।
सितारे धूपमें, हम देापहरको देखते हैं ॥२॥
बहरमें मोती पानी पानी, लाल का तूँ पत्थर में ।
देखो, लबो दन्दोंसे, तुम्हारे लालो गुहरेके मगड़े हैं ॥३॥
न क्यों तेरे दाँतोंसे, फूँटा हो जाती ।
कि दावा किया था, सफ़ाईका फूटा ॥४॥
वह चन्द्रमुखी रातको जो हँसी, तो उसकी दाँतों की क़तर की चमकसे मुके ऐसा मालूम हुआ ; गोया चन्द्रमाके टुकड़े-टुकड़े हो गये ॥१॥
माहतावों=चाँद । माहपारा=चन्द्रबदनी । पारा पारा हो गया=टुकड़े-टुकड़े हो गया । अरुण=ब्राह्म । खूब=गाल । क़तरा=बूँद । बहर=अमुद । खब=होठ ।