शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( २३८ )
के चाँदसे उसके मुखकी, चाँदनीसे ठावण्यकी, कमलसे नेत्रोंकी, प्रवालसे होठोंकी और चम्पाकी कलियोंसे दाँतोंकी तुलना करू ।
उर्दू कवियोंकी मनोहर उक्तियाँ ।
कोई खियोंके दाँतोंकी तारीफ़ करता है, तो कोई उसके होठोंकी प्रशंसामें कविता रचता है, और कोई उसके गालके तिल पर ही अपनी शायरीका खातमा करता है । उर्दू-कवियोंकी तारीफ़ोंके नमूने भी देखिये :—
दाँत तूँ चमके हँसीमें रात उस माहपारिके ।
मैंने जाना, माहतावों पारा-पारा हो गया ॥१॥
अरुणके कतरे, नहीं देखते हैं उस खूब पर ।
सितारे धूपमें, हम देापहरको देखते हैं ॥२॥
बहरमें मोती पानी पानी, लाल का तूँ पत्थर में ।
देखो, लबो दन्दोंसे, तुम्हारे लालो गुहरेके मगड़े हैं ॥३॥
न क्यों तेरे दाँतोंसे, फूँटा हो जाती ।
कि दावा किया था, सफ़ाईका फूटा ॥४॥
वह चन्द्रमुखी रातको जो हँसी, तो उसकी दाँतों की क़तर की चमकसे मुके ऐसा मालूम हुआ ; गोया चन्द्रमाके टुकड़े-टुकड़े हो गये ॥१॥
माहतावों=चाँद । माहपारा=चन्द्रबदनी । पारा पारा हो गया=टुकड़े-टुकड़े हो गया । अरुण=ब्राह्म । खूब=गाल । क़तरा=बूँद । बहर=अमुद । खब=होठ ।
( २३६ )
उसके गाल पर पसीनेकी बूँदें नहीं हैं, वे तो द्रोणहरके समय धूपमें तारे दिखाई दे रहे हैं ॥२॥
तेरे दाँतों की आभाको देखकर, समन्दरमें मोती शर्मके मारे पानी-पानी हो रहा है और तेरे ओठों की सुखीको देखकर लाल-का दिल पहाड़ की गुफामें स्पन्दकिके मारे खून हो गया है । देख तो सही, तेरे दाँत और होठोंके कारण, मोती और लालों की कौसी बुरी दशा हो रही है ॥३॥
मोतीने तेरे दाँतोंसे सफाईमें बढ जानेका दावा किया था ; मगर वह तेरे दाँतोंके मुकाबलेमें झूठा निकला ॥४॥
एक हिन्दी कवि की भी फाब्यकला-कुशलताका नमूना देखिये :—
गोरे मुख पर तिल लसत, ताहि करूँ प्रणाम ।
मानो चन्द्र विद्याय कर, पौड़े शालग्राम ॥
गोरे मुँह पर जो तिल शोभायमान है, उसमें प्रणाम करता हूँ ; क्योंकि मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमाको बिछाकर शालग्राम सो रहे हों ।
मिथ्या नज़ीर अकबराबादीकी तारीफ़ोंके भी चन्द्र नमूने देखिये :—
छोटासा खाल, उस खूब खुशोद ताब में ।
ज़रा समा गया है, दिले भापताबमें ॥
( २४० )
उस सूर्यकी भाँति चमकनेवाले मुख पर छोटासा तिल देखने में ऐसा मालूम होता है, जैसे सूर्यमें एक छोटा सा कण ।
सहर इस क्षमकत्ते आया, नज़र एक निगार राना ।
कि खुद उसके हुस्ने खूबको, लगा तकने जुरा आसा ॥
सवेरे ही मुझे एक सुन्दर प्रतिमा दिखाई दी कि, मैं सूर्य-कण की भाँति उसके मुखारविन्द की शोभाको देखने लगा ; यानी सूर्य उसके सामने कण की तरह था ।
बुतोंकी मजलिसमें शबको माहूर,
जो और टुक भी क्याम करता ।
कनिश्त वीरों सनमको बन्दा,
ब्रह्मनोको गुलाम करता ॥
अगर वह चन्द्रमुखी मूर्तियों की सभामें रातको जरा देर और ठहर जाती, तो मन्दिर उजड़ जाते, मूर्तियाँ उसकी गुलाम हो जातीं और ब्राह्मण—पुजारी उसके सेवक हो जाते । उसके सौन्दर्य पर देवता और मनुष्य दोनों मोहित हो जाते हैं ।
सफाई उसकी भलकली है, गोरे सीनेमें ।
चमक कहाँ है, य अलमासके नगीनेमें ॥
उसके गोरे सीनेमें जो सफाई और चमक-दमक भलक रही है, अलमासके नगीनेमें वह चमक कहाँ है ?
( २४१ )
नहीं हवामें य वृ नाफए ुखुतनकी सी ।
लपट है य तो, किसी जुल्के पुरशिकनकीसी ॥
हवामें जो महक आ रही है, यह ुखुतन देशकी कस्तूरीकी नहीं है । मुझे तो यह उसकी घूँघर वाली लट्ठोंकी महक सी मालूम होती है ।
महाकवि गालिबके भी चन्द नमूने देखिये :—
जहाँ तेरा नकशे कदम देखते हैं ।
ख़याबों ख़याबों इरम देखते हैं ॥
जहाँ हमें तेरा चरण-चिह्न दिखाई देता है, उसी स्थानको हम स्वर्गसे बढ़कर समझते हैं ।
महाकवि दाग का भी एक नमूना लीजिये :—
बुभू गया गुलरूके आगे, शमा और गुलका चिराम् ।
बुलबुलोंमें शोर, परवानोंमें मातम हो गया ॥
उसके सुन्दर मुखके आगे दीपक और फूल दोनोंकी प्रभा फीकी पड़ गई । तभी तो बुलबुले शोर कर रही हैं और परवाने (पनङ्ग) शोक मना रहे हैं ।
कहाँ तक लिखें, विद्वानोंने स्त्रियोंकी तारीफ़ में पोथे-के-पोथे लिख डाले हैं ।
अपदेशक की सलाह ।
अगर कोई ज्ञानी पुरुष इन स्त्री-दासोंको नसोहत देता है, उनको स्त्रियोंकी प्रीतिका नफ़ा-नुकसान समझता है, तो ये
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( २४२ )
चिढ़ते और उसे खोटी-खरी सुनाते हैं। अगर कोई कहता है— मैया ! यह राह—प्रेमकी राह—बड़ी खराब है। इसमें बड़ी तक- लीफें हैं। महाकवि दागने कहा है :—
पुरी है ऐ दागू राहे उल्लत । खुदा न ले जाय ऐसे रास्ते । जो अपनी तुम सैर चाहते हो । तो भूलकर दिरलगी न करना ।
ऐ दागू ! प्रेमकी राह पुरी है। भगवान् इस राहसे किसी को न ले जाय। जो तुम अपना भला चाहते हो, तो भूलकर भी इस राह पर कदम न रखना।
उस्ताद ज़ौकने भी कहा है :—
मालूम जो होता अन्जामे सुहृवत । लेते न कभी भूलके हम नामे सुहृवत ॥
अगर मुझे प्रेमका नतीजा मालूम होता, तो मैं कभी भूलके भी प्रेमका नाम न लेता।
भाई ! प्रेमका नाम लेना सहज है, पर प्रेम करना कठिन है। भाँग खाना सहज है, पर उसकी लहरें सहना मुश्किल है। इस राहमें मजन्तूर और फ़रहाद की जो दुर्दशा हुई, वह क्या तुम्हें नहीं मालूम ? इसमें जान तकके लाले पड़ जाते हैं। इन बातोंको सुन कर स्त्री-दास फ़रमाते हैं :—
( २४३ )
स्त्री-दामका जवाब ।
मर गये तो मर गये, हम इश्कमें नासह को क्या । मौत आनेके लिये है, जान जानेके लिये ॥
जिसने दिल खोया, उसी को कुछ मिला । फायदा देखा, इसी नुकसान में ॥
हम इश्कमें मर गये तो मर गये, उपदेशक महाशयकी क्या हानि ? मौत आनेको है और जान जानेको है । जिसने किसीको दिल दिया, उसे ही कुछ मिला । हमने तो इसी हानिमें लाभ देखा ।
उपदेशकजी ! प्रेममय जीवन ही जीवन है । जिसमें प्रेम नहीं, उसका जीवन सारशून्य—थोथा है । गुलाबमें कटि है, पर क्या काँटोंके भयसे लोग गुलाबको छोड़ सकते हैं ? चन्दनके वृक्षोंपर सर्प लिपटे रहते हैं, तो क्या सर्पोंके भयसे कोई चन्दनको ग्रहण नहीं करता ? मनुके छत्ते पर विपैली मनु-मक्खियाँ छाई रहती हैं, तो क्या कोई मनुका छत्ता तोड़ कर मनु नहीं लेता ? हज़ार दुःख-कष्ट भेटने पड़े, मैं भेटूँगा ; क्यों कि मुझे अपनी माशूका बिना नहीं सर सकता । किसीने कहा है :—
हैं तेरी राहें मुहच्यत में, हज़ारों फितने । देख मुझको, वजुज इस राहके चलता ही नहीं ॥
( २४४ )
देखिये मिष्टर शिलर महोदय कहते हैं—“I have experienced earthly happiness ; I have lived and I have loved.” मैंने पार्थिव जीवनका अनुभव किया है । मैंने जीवनोपयोग किया है और प्रेम भी किया है ।
होल्टी महोदय कहते हैं—“Love converts the cottage into a palace of gold.” प्रेम भोपड़ेको सुवर्णमय महलमें परिणत कर देता है ।
कोरनर महोदय कहते हैं—“Only since I loved is life lovely ; only since I loved knew I that I loved.” जबसे मैंने प्रेम किया, तभीसे मैंने अनुभव किया कि, मैं जीवित हूँ ।
कहिये पाठक ! विद्वानोंके ये जवाब सुनकर आपका दिल भरा या नहीं ? जब विद्वानोंका यह हाल है, तब मूर्खोंका क्या कहना ? उनको दोषी ठहराना अन्याय है । जब शास्त्र-ज्ञाता पण्डित ही इन मोहिनियोंके जालोंमें फँस जाते हैं, तब और इनसे कौन बच सकता है ? कहा है—
मनुष्य दुर्लभ प्राप्य वेदशास्त्रायधीत्य च ।
वध्यते यदि संसारे को विमुच्यते मानवः ॥
दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर और वेदशास्त्र पढ़कर भी यदि मनुष्य संसार-बन्धनमें बँध जावे, तो संसार-बन्धनसे कौन छूटेगा ?
( २४५ )
और भी—
पाठकाः पठितारश्च ये चान्ये शास्त्रचित्तकाः ।
सर्वेव्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान्सपण्डितः ॥
जो शास्त्र पढ़ने और पढ़ानेवाले केवल शास्त्रोंको विचारते हैं, पर उन पर अमल नहीं करते, वे मूर्ख और व्यसनी हैं। जो उनको पढ़ कर स्त्री-पुत्र और धन-दौलत प्रभृतिसे विरक्त होते हैं, वही पण्डित हैं।
स्त्रियां जगत् की भूँटन, नरक-कूप, महागन्दी और अपवित्र हैं। इनके भीतर राघ लोह पीप और खवार प्रभृतिके पनारे बह रहे हैं। यह गुप्सद की कुलई की तरह ऊपर हीसे सोहनी मालूम होती हैं। देखिये, गिरिधर कविराय क्या कहते हैं :—
कुण्डलिया ।
नारी थोणी नरककी, है प्रसिद्ध नहीं लुकी ।
यथा सभान परकीया, तथा जान ले स्वकी ॥
तथा जान ले स्वकी, तीनको एक रूपम् ।
धस्थ मांस नख चर्म, रोम मल मूर्त्रहि रूपम् ॥
कह गिरिधर कविराय, पुरुष इन कियो अजारी ।
ऐसा दुष्ट न और, जगत्में जैसी नारी ॥
( २४६ )
कुण्डलिया ।
कान्ता उत्पल-लोचना, प्रिया क्रशोदरि बाल ।
घटस्तनी पंकजमुखी, कामिनि-अधर प्रवाल ॥
कामिनि-अधर प्रवाल, सुभु कहि-कहिके बोले ।
आनंद अधिक उद्वाह, मत्त बन परिणत डोले ॥
अशुचि-पूतरी नारि, ताहि मन जाने शान्ता ।
महा नरककी खान, मोह-बस मानै कान्ता ॥७२॥
अपनी और पराई रूपवती और कुरुपा सभी नारियाँ मलमूत्रकी खान और नरकद्वार की कुञ्जी हैं ; पर मोहान्ध होनेसे परिणतों और विचारवानोंको भी यह असली बात समझ नहीं पड़ती । इसीसे वे इन की प्रशंसाके पुल बाँधते हैं ।
72. How wonderful is the action of delusion because people at the sight of the woman who is impurity personified eagerly describe her thus.—“How beautiful is she”, “she is lotus-eyed”, “her hips are very big in size”, “her breasts are high and full-grown” “her lotus-like face is very handsome and her brows are very fascinating” at her sight they are charmed, become infatuated, constantly remember her and praise her.
—*—
( २४७ )
स्मृता भवति तापाय दृष्टा चोन्मादवर्द्धिनी ।
स्पृष्टा भवति मोहाय सा नाम दयिता कथम् ॥७३॥
जो स्त्री स्मरणमात्र करनेसे सन्ताप करती है, देखते ही उन्माद बढ़ाती है और छूते ही मोह उत्पन्न करती है, उसेन जाने क्यों प्राणप्यारी कहते हैं ॥७३॥
खुलासा—जिसके खाली याद आनेसे ही मनमें वेदना सी होने लगती है, जिसके देखनेसे मनुष्य मतवाला और पागल सा हो जाता है और जिसके छूनेसे ही विवेक और ज्ञानका नाश होकर, मोहकी बढ़ती होती है, ऐसी कदम-कदम पर दुःख देने-वाली स्त्रीको लोग प्यारी, प्राणप्यारी, प्रिया, कल्याणी, प्राणाधिका प्रभृति क्यों कहते हैं, यह बात समझमें नहीं आती ?
वास्तवमें स्त्री दुःख और आपदाओंकी खान है, पर लोगोंको यह बात मालूम नहीं होती । वजह यह है कि, हिम्रोटाइज़ करने वालोंकी तरह, स्त्री नज़र-से-नज़र मिलते ही, अपनी जादूमरी आँखोंसे, मदिरा की तरह, मोह पैदा कर देती है । उस मोहसे मनुष्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है । ज्ञान नष्ट हो जानेसे उसे कुछ-का-कुछ दीखने लगता है । जिस तरह मोहान्ध पुरुष अभक्ष्यको भक्ष्य, अकार्यको कार्य और दुर्गमको सुगम समझने लगता है ; उसी तरह, साक्षात् विष होने पर भी, मोहान्धको स्त्री विषसी न दीखकर अमृतसी दीखती है । अमृतसी दीखनेकी वजहसे ही कामान्ध पुरुष उसे “प्राणप्यारी” कहते हैं ।
( २४८ )
दोहा ।
सुधि आये सुधि-डुधि हरत, दरसन करत अचेत ।
परसत मन मोहित करत, यह प्यारी किहि हेत ॥७२॥
73. How can we call a woman "beloved" whose recollection even gives pain, whose very sight increases intoxication of mind and whose touch creates a great sensation in us.
—*
तावेदेवामृतभयी यावलोचनगोवरा ।
चतुः पथाद्भगता विपाद्ध्यतिरिच्यते ॥७४॥
स्त्री जब तब आँखोंके सामने रहती है, तबतक अमृतसी मालूम होती है ; किन्तु आँखोंकी ओट होते ही, विषसे भी अधिक दुःखदायिनी हो जाती है ॥७४॥
खुलासा—स्त्री पुरुषके पास होनेसे निश्चय ही अमृत सी मालूम होती है ; क्योंकि वह अपने हाव-भाव, कटाक्ष और मधुर वचन तथा सेवा प्रभृतिसे पतिके चित्तको हार्यमें लिये रहती है ; पर अलग होते ही मनमें भारी विरह-वेदना करती है । वियोग-विकल पुरुषका खाना-पीना और नियमित समय पर सोना प्रभृति छूट जाता और साथ ही स्वास्थ्य तक नष्ट हो जाता है । स्त्रीका विरह पुरुषके शरीर पर जहरका काम करता है । उसके मर्ममें घोर सन्ताप होता है । इसीसे कहा है कि, स्त्री आँखोंके सामनेसे हटते ही विषवत् हो जाती है ।
श्रीमान्
रबी जन्म तक आर्यों के मानने रहती है, अस्सल मी मायूस होती है : आर्यों की छोट होने ही शिव ने भी अधिक दुखहायिनी हो जाती है। इन चित्रमें ऊपर पुरन कोंक मानने देटा हुआ नृत्य-मुद्रा पान कर रहा है, किन्तु नीचे जराडे में दुर्गा है यही भाव कियेया है।
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( २४६ )
ऐसी ही बात महाकवि कालिदासने “शृङ्गार-तिलक” में कही है :—
अपूर्वो दृश्यते वह्निः, कामिन्याः स्तनमण्डले ।
दूरतो दहते गानं, हृदि लभस्तु शीतलः ॥
कामिनीके स्तनमण्डलोंमें अपूर्व अग्नि है, जो दूरसे तो शरीर को जलाती है और हृदयसे लगाने पर शीतल हो जाती है ।
मतलब यह है कि, स्त्री स्मरण करनेसे सन्ताप करती, देखनेसे चित्तको हर लेती और मनुष्यको अन्ध्या बना देती, छूनेसे बल नाश करती, सम्भोग करनेसे वीर्यका नाश करती और नेत्रोंके सामनेसे हटने पर विरहाग्निमें जलाती है । स्त्री से किसी तरह भी पुरुषको सुख नहीं । स्मरण करनेमें सुख, न देखनेमें सुख ; छूनेमें सुख, न भोगनेमें सुख ; पास रहनेमें सुख, न अलग होनेमें सुख । फिर भी लोग स्त्री पर जान देते हैं, यह क्या कम आश्चर्यकी बात है ?
वियोगिण्योके सम्बन्धेम् उर्द्वं कवियोंकी उत्पत्तिः ।
प्राणप्यारी स्त्री अथवा आश्रानाकी जुदाईमें पुरुष पागल सा हो जाता है । उसके शरीरमें धून और मांसका नाम नहीं रहता —हुड़ोंका कड़ाल रह जाता है । जिन्दगी भार मालूम होती है । विरही पुरुष हर क्षण मौत को याद करता है ; पर मौत भी, उस विपत्तिके समयमें, उससे चैर सा कर लेती है । यहाँ
( २५० )
हम, अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ, उर्दू-कवियोंकी चन्द कवितायें देते हैं। पाठक देखें कि, विरही पुरुषोंकी क्या हालत होती है :—
वह मैं कि मुझे आलमे बालाकी खबर थी ।
ऐ बेखबरी ! खाक नहीं अपनी खबर आज ॥
एक दिन था कि, मुझे पृथ्वी ही नहीं—स्वर्ग तक की बात मालूम थी ; पर आज मुझे अपनी भी खबर नहीं कि हूँ या नहीं हूँ । बेखबरी ! तेरा भला हो । प्यारीकी जुदाई की वजहसे अजब बेखबरी—बेहोशी छाई हुई है ।
बेकसी सदमये हिज्राँकी मुझे ताव नहीं ।
काश दुश्मन ही चले आयें जो अहबाव नहीं ॥
एक तो विरहका दुःख और उस पर विजनता ; बताइये, किस तरह कोई दुःख उठाये । मैंने माना कि, मेरे मित्र नहीं हैं, जो आकर मुझे धीरज दें ; पर शत्रु तो हैं, वही चले आवे ; जिससे विजनता तो किसी तरह कम हो ।
सब्र आना तो मुहब्बतमें, बहुत मुश्किल है ।
मौत भी तो नहीं इसको, वह काफिर दिल है ॥
प्रेममें धीरज आना तो बहुत कठिन है । इस काफिर दिलको
आलमेबाला=स्वर्ग । बेकसी=मजबूरी । सदमये=तकलीफ । हिज्राँ=विशोग । काश=खुदा करे । अहबाव=मित्र ।
( २५१ )
मौत भी नहीं आती ! यह प्रेमकी आगमें तप कर ऐसा कटोर हो जाता है कि, मौत भी इसे शान्ति नहीं दे सकती । बेचारे धैर्यकी तो बात ही क्या ?
कौन गमख्वार इलाही शबेगम होता है ।
अब तो पहलूमें मेरे दर्द भी कम होता है ॥
दुःखकी रातमें कोई किसीका साथी नहीं होता । मुझे आज अत्यन्त दुःख है । शायद, इसीलिये, हज़रते दर्द भी मेरे दिलसे आज खिसक गये हैं । उनके होनेसे तथियत वहलती रहती थी । ( शायराना नाज़ुक खयाली का अन्त हो गया ) ।
अमीर महोदय कहते हैं—
पुतलियाँ तक भी तो फिर जाती हैं, देखो दम निज़ा !
वक्त पड़ता है, तो सब आँख चुरा जाते हैं ॥
जब चुरा समय आता है, तब पुतलियाँ तक फिर जाती हैं । अपने-बेगाने सब आँख चुरा जाते हैं : कोई काम नहीं आता ।
कोई और कवि कहता है :—
होता नहीं है, कोई चुरे वक्तमें शरीक ।
पत्ते भी भागते हैं, खिज़ौमें शजरसे दूर ॥
गमख्वार=गम खानेवाला दोस्त । शब=रात । शबेगम=रंजकी रात । खिज़ौ=पतकड़ । शजर=वृक्ष ।
( २५२ )
बुरे समयमें कोई साथी नहीं होता ; पतझड़में पत्ते भी वृक्ष को छोड़ भागते हैं ।
वियोगी कहता है, कि मेरा यार मेरे पास नहीं । उसकी जुदाईकी मुसीबतका पहाड़ मुझ पर फट पड़ा है । ऐसे वक्तमें मौत आकर मेरे दुःखोंका अन्त कर दे तो भला हो ; पर हाय ! वह भी ऐसे कठिन समयमें, बुलानसे भी, नहीं आती !
एक विरही कहता है :—
मैं जाग रहा हूँ हिज्रकी शब ।
पर मेरे नसीब सो रहे हैं ॥
इस वियोगकी रातमें मैं जाग रहा हूँ, पर मेरे नसीब सो रहे हैं ; यानी मेरा यार मेरे पास नहीं आता ।
हिज्रकी यह रात, कैसी रात है !
एक मैं हूँ या खुदा की जात है ॥
वियोग—जुदाई की यह रात कैसी रात है कि, एक मैं हूँ या मेरा खुदा है ; दूसरा कोई नहीं ।
तारे ही गिनके काटते, रात फिराककी मगरे ।
निकला सितारह भी कहीं, कोई तो खाल-खालसा ॥
वियोगकी रातको हम तारे गिन-गिन कर ही काट देते, पर
हिज्र—वियाग । खाल-खालसा—दूरी पर—बहुत कम ।
( २५३ )
हमारा दुर्भाग्य तो देखिये कि, उस रातको तारे भी निकले तो बहुत ही कम निकले।
आशुक्को ज़रा सी जुदाई भी कैसी अखरती है, उसका भी नमूना देखिये :—
शबे वस्ल खिली चाँदनी।
वह धवराके बोले सहर हो गई ॥
मिलनकी रातको चाँदनी ऐसी खिली कि, दिन सा मालूम होने लगा। वह धवरा कर बोले—“हाय ! सवेरा हो गया, अब जुदाई के सदमे उठाने होंगे।
दी मुञ्ज्जनने शबे-वस्ल अजैँ पिछली रात।
हाय कम्बलतको किस वक्त खुदा याद आया ॥
मिलनेकी रातको, तड़का होनेसे कुछ पहले, मुल्लाने अजैँ दी, तो वह धवराके बोले—“हाय ! कम्बलतको किस वक्त खुदा याद आया। अब हम अलग-अलग हो जायँगे !”
किसी विरहीसे किसीने उसकी मिज़ाज-पुसों की—कुशल-प्रश्न किया ; तो आप कहने लगे :—
न प्रूछो कि दिल शाद है या हर्जी है।
ख़वर भी नहीं कि है या नहीं है ॥
शबेवस्ल—मुलाक़ान की रात। सहर—सवेरा। मुञ्ज्जन = मुल्ला जो मसजिदमें चार बड़ी रात रहे अज़ाँ देता है। उस समय दीनदार मुसलमान
( २५४ )
क्या पूछते हो हमारा दिल खुश है या नाखुश ? हमें तो यह भी खबर नहीं कि, वह है भी या नहीं।
बिरहकी रातका वर्णन उस्ताद जौफ़ने खूब किया है। उसका ज़रासा नमूना हम देते हैं ; जिन्हें सबका आनन्द लेना हो, वे हरिदास एण्ड कंपनी, कलकत्ता, से "उस्ताद जौफ़" मँगा देखें।
कहूँ क्या जौफ़ बहवाले शबे हिज्र।
कि थी एक-एक वडी सौ-सौ महीने ॥१॥
कहा जी ने मुझे यह हिज्र की रात।
यकी है सुबह तक देगी न जीने ॥२॥
दे जौफ़ ! बियोग-जुदाईकी रातका हाल क्या कहूँ ? एक-एक वडी सौ-सौ महीने सौ मालूम होती थी।
दिलने कहा कि, यह बियोग की रात है। निश्चय है, कि यह सबेरे तक ज़िन्दा न रहने देगी।
महाकवि नज़ीर की शायरीकी बानगी भी देख लीजिये—
किया जो यारने हमसे पयाम रखसतका।
तो दम निकल गया सुनते ही नाम रखसतका ॥
यारने जो हमसे विदाई की बात छेड़ी, तो विदाईका नाम सुनते ही हमारा दम निकल गया।
हाथ मुँह धोकर मसजिदमें जा नमाज़ पढ़ते हैं। अर्ज़ा—र्गा। ब्राद—खुश। इर्ज़ा—रुज्जीदा।
शबे हिज्र—बियोग की रात। पयाम—पैगाम। रखसत—विदाई, बुहो।
( २५५ )
अब जरा विरही की कमजोरीके नमूने भी मुलाहिजा फ़र- माइये :—
मुफ़्त जुल्फ़के मारेको ज़ज़ीर मत पिन्हाओ ।
काफ़ी है मेरी क़ैदको एक मकड़ीका जाला ।
मुफ़्त जुल्फ़के मारे को ज़ज़ीर मत पहनाओ । मेरे बदनमें जरा भी दम नहीं । मैं जुदाईके कष्ट उठाते-उठाते एकदम दुर्बल हो गया हूँ । मेरे क़ैद करनेके लिये एक मकड़ीका जाला ही काफ़ी है ।
और भी :—
ये नातवाँ कि आया जो यार मिलनेको ।
तो सूरत उसकी, उठाकर पलक न देख सका ।
यार की जुदाईमें ऐसा कमज़ोर हो गया हूँ कि, जब यार मुफ़्त से मिलनेकी आया, तो मैं पलक उठाकर उसकी सूरत तक न देख सका ।
कहिये पाठक ! अब तो आप न देख लिया कि, प्यारीकी जुदाईमें वियोगी पुरुषोंकी क्या दुर्दशा होती है । जब तक स्त्रियाँ सामने रहती हैं, तभी तक सामने स्वर्ग दीखता है ; उनके नज़रोंकी ओट होते ही प्राण निकलने लगते हैं—मृत्यु- कालसे भी अधिक वेदना होती है ।
कुलुक—लट ।
सुवना—यदि ऐसी-ऐसी शेरों और गज़लोंका आनन्द लूटना चाहते हैं ; तो श्रीमाल पण्डित ज्वालादेवजी शर्मा कृत “उस्ताद ज़ौक”, “महाकवि