भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २५५ )

अब जरा विरही की कमजोरीके नमूने भी मुलाहिजा फ़र- माइये :—

मुफ़्त जुल्फ़के मारेको ज़ज़ीर मत पिन्हाओ ।

काफ़ी है मेरी क़ैदको एक मकड़ीका जाला ।

मुफ़्त जुल्फ़के मारे को ज़ज़ीर मत पहनाओ । मेरे बदनमें जरा भी दम नहीं । मैं जुदाईके कष्ट उठाते-उठाते एकदम दुर्बल हो गया हूँ । मेरे क़ैद करनेके लिये एक मकड़ीका जाला ही काफ़ी है ।

और भी :—

ये नातवाँ कि आया जो यार मिलनेको ।

तो सूरत उसकी, उठाकर पलक न देख सका ।

यार की जुदाईमें ऐसा कमज़ोर हो गया हूँ कि, जब यार मुफ़्त से मिलनेकी आया, तो मैं पलक उठाकर उसकी सूरत तक न देख सका ।

कहिये पाठक ! अब तो आप न देख लिया कि, प्यारीकी जुदाईमें वियोगी पुरुषोंकी क्या दुर्दशा होती है । जब तक स्त्रियाँ सामने रहती हैं, तभी तक सामने स्वर्ग दीखता है ; उनके नज़रोंकी ओट होते ही प्राण निकलने लगते हैं—मृत्यु- कालसे भी अधिक वेदना होती है ।

कुलुक—लट ।

सुवना—यदि ऐसी-ऐसी शेरों और गज़लोंका आनन्द लूटना चाहते हैं ; तो श्रीमाल पण्डित ज्वालादेवजी शर्मा कृत “उस्ताद ज़ौक”, “महाकवि