शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५५ )
अब जरा विरही की कमजोरीके नमूने भी मुलाहिजा फ़र- माइये :—
मुफ़्त जुल्फ़के मारेको ज़ज़ीर मत पिन्हाओ ।
काफ़ी है मेरी क़ैदको एक मकड़ीका जाला ।
मुफ़्त जुल्फ़के मारे को ज़ज़ीर मत पहनाओ । मेरे बदनमें जरा भी दम नहीं । मैं जुदाईके कष्ट उठाते-उठाते एकदम दुर्बल हो गया हूँ । मेरे क़ैद करनेके लिये एक मकड़ीका जाला ही काफ़ी है ।
और भी :—
ये नातवाँ कि आया जो यार मिलनेको ।
तो सूरत उसकी, उठाकर पलक न देख सका ।
यार की जुदाईमें ऐसा कमज़ोर हो गया हूँ कि, जब यार मुफ़्त से मिलनेकी आया, तो मैं पलक उठाकर उसकी सूरत तक न देख सका ।
कहिये पाठक ! अब तो आप न देख लिया कि, प्यारीकी जुदाईमें वियोगी पुरुषोंकी क्या दुर्दशा होती है । जब तक स्त्रियाँ सामने रहती हैं, तभी तक सामने स्वर्ग दीखता है ; उनके नज़रोंकी ओट होते ही प्राण निकलने लगते हैं—मृत्यु- कालसे भी अधिक वेदना होती है ।
कुलुक—लट ।
सुवना—यदि ऐसी-ऐसी शेरों और गज़लोंका आनन्द लूटना चाहते हैं ; तो श्रीमाल पण्डित ज्वालादेवजी शर्मा कृत “उस्ताद ज़ौक”, “महाकवि