शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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क्या पूछते हो हमारा दिल खुश है या नाखुश ? हमें तो यह भी खबर नहीं कि, वह है भी या नहीं।
बिरहकी रातका वर्णन उस्ताद जौफ़ने खूब किया है। उसका ज़रासा नमूना हम देते हैं ; जिन्हें सबका आनन्द लेना हो, वे हरिदास एण्ड कंपनी, कलकत्ता, से "उस्ताद जौफ़" मँगा देखें।
कहूँ क्या जौफ़ बहवाले शबे हिज्र।
कि थी एक-एक वडी सौ-सौ महीने ॥१॥
कहा जी ने मुझे यह हिज्र की रात।
यकी है सुबह तक देगी न जीने ॥२॥
दे जौफ़ ! बियोग-जुदाईकी रातका हाल क्या कहूँ ? एक-एक वडी सौ-सौ महीने सौ मालूम होती थी।
दिलने कहा कि, यह बियोग की रात है। निश्चय है, कि यह सबेरे तक ज़िन्दा न रहने देगी।
महाकवि नज़ीर की शायरीकी बानगी भी देख लीजिये—
किया जो यारने हमसे पयाम रखसतका।
तो दम निकल गया सुनते ही नाम रखसतका ॥
यारने जो हमसे विदाई की बात छेड़ी, तो विदाईका नाम सुनते ही हमारा दम निकल गया।
हाथ मुँह धोकर मसजिदमें जा नमाज़ पढ़ते हैं। अर्ज़ा—र्गा। ब्राद—खुश। इर्ज़ा—रुज्जीदा।
शबे हिज्र—बियोग की रात। पयाम—पैगाम। रखसत—विदाई, बुहो।