शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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हमारा दुर्भाग्य तो देखिये कि, उस रातको तारे भी निकले तो बहुत ही कम निकले।
आशुक्को ज़रा सी जुदाई भी कैसी अखरती है, उसका भी नमूना देखिये :—
शबे वस्ल खिली चाँदनी।
वह धवराके बोले सहर हो गई ॥
मिलनकी रातको चाँदनी ऐसी खिली कि, दिन सा मालूम होने लगा। वह धवरा कर बोले—“हाय ! सवेरा हो गया, अब जुदाई के सदमे उठाने होंगे।
दी मुञ्ज्जनने शबे-वस्ल अजैँ पिछली रात।
हाय कम्बलतको किस वक्त खुदा याद आया ॥
मिलनेकी रातको, तड़का होनेसे कुछ पहले, मुल्लाने अजैँ दी, तो वह धवराके बोले—“हाय ! कम्बलतको किस वक्त खुदा याद आया। अब हम अलग-अलग हो जायँगे !”
किसी विरहीसे किसीने उसकी मिज़ाज-पुसों की—कुशल-प्रश्न किया ; तो आप कहने लगे :—
न प्रूछो कि दिल शाद है या हर्जी है।
ख़वर भी नहीं कि है या नहीं है ॥
शबेवस्ल—मुलाक़ान की रात। सहर—सवेरा। मुञ्ज्जन = मुल्ला जो मसजिदमें चार बड़ी रात रहे अज़ाँ देता है। उस समय दीनदार मुसलमान