भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २५२ )

बुरे समयमें कोई साथी नहीं होता ; पतझड़में पत्ते भी वृक्ष को छोड़ भागते हैं ।

वियोगी कहता है, कि मेरा यार मेरे पास नहीं । उसकी जुदाईकी मुसीबतका पहाड़ मुझ पर फट पड़ा है । ऐसे वक्तमें मौत आकर मेरे दुःखोंका अन्त कर दे तो भला हो ; पर हाय ! वह भी ऐसे कठिन समयमें, बुलानसे भी, नहीं आती !

एक विरही कहता है :—

मैं जाग रहा हूँ हिज्रकी शब ।

पर मेरे नसीब सो रहे हैं ॥

इस वियोगकी रातमें मैं जाग रहा हूँ, पर मेरे नसीब सो रहे हैं ; यानी मेरा यार मेरे पास नहीं आता ।

हिज्रकी यह रात, कैसी रात है !

एक मैं हूँ या खुदा की जात है ॥

वियोग—जुदाई की यह रात कैसी रात है कि, एक मैं हूँ या मेरा खुदा है ; दूसरा कोई नहीं ।

तारे ही गिनके काटते, रात फिराककी मगरे ।

निकला सितारह भी कहीं, कोई तो खाल-खालसा ॥

वियोगकी रातको हम तारे गिन-गिन कर ही काट देते, पर

हिज्र—वियाग । खाल-खालसा—दूरी पर—बहुत कम ।