शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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बुरे समयमें कोई साथी नहीं होता ; पतझड़में पत्ते भी वृक्ष को छोड़ भागते हैं ।
वियोगी कहता है, कि मेरा यार मेरे पास नहीं । उसकी जुदाईकी मुसीबतका पहाड़ मुझ पर फट पड़ा है । ऐसे वक्तमें मौत आकर मेरे दुःखोंका अन्त कर दे तो भला हो ; पर हाय ! वह भी ऐसे कठिन समयमें, बुलानसे भी, नहीं आती !
एक विरही कहता है :—
मैं जाग रहा हूँ हिज्रकी शब ।
पर मेरे नसीब सो रहे हैं ॥
इस वियोगकी रातमें मैं जाग रहा हूँ, पर मेरे नसीब सो रहे हैं ; यानी मेरा यार मेरे पास नहीं आता ।
हिज्रकी यह रात, कैसी रात है !
एक मैं हूँ या खुदा की जात है ॥
वियोग—जुदाई की यह रात कैसी रात है कि, एक मैं हूँ या मेरा खुदा है ; दूसरा कोई नहीं ।
तारे ही गिनके काटते, रात फिराककी मगरे ।
निकला सितारह भी कहीं, कोई तो खाल-खालसा ॥
वियोगकी रातको हम तारे गिन-गिन कर ही काट देते, पर
हिज्र—वियाग । खाल-खालसा—दूरी पर—बहुत कम ।