भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २५१ )

मौत भी नहीं आती ! यह प्रेमकी आगमें तप कर ऐसा कटोर हो जाता है कि, मौत भी इसे शान्ति नहीं दे सकती । बेचारे धैर्यकी तो बात ही क्या ?

कौन गमख्वार इलाही शबेगम होता है ।

अब तो पहलूमें मेरे दर्द भी कम होता है ॥

दुःखकी रातमें कोई किसीका साथी नहीं होता । मुझे आज अत्यन्त दुःख है । शायद, इसीलिये, हज़रते दर्द भी मेरे दिलसे आज खिसक गये हैं । उनके होनेसे तथियत वहलती रहती थी । ( शायराना नाज़ुक खयाली का अन्त हो गया ) ।

अमीर महोदय कहते हैं—

पुतलियाँ तक भी तो फिर जाती हैं, देखो दम निज़ा !

वक्त पड़ता है, तो सब आँख चुरा जाते हैं ॥

जब चुरा समय आता है, तब पुतलियाँ तक फिर जाती हैं । अपने-बेगाने सब आँख चुरा जाते हैं : कोई काम नहीं आता ।

कोई और कवि कहता है :—

होता नहीं है, कोई चुरे वक्तमें शरीक ।

पत्ते भी भागते हैं, खिज़ौमें शजरसे दूर ॥


गमख्वार=गम खानेवाला दोस्त । शब=रात । शबेगम=रंजकी रात । खिज़ौ=पतकड़ । शजर=वृक्ष ।

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