भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २५० )

हम, अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ, उर्दू-कवियोंकी चन्द कवितायें देते हैं। पाठक देखें कि, विरही पुरुषोंकी क्या हालत होती है :—

वह मैं कि मुझे आलमे बालाकी खबर थी ।

ऐ बेखबरी ! खाक नहीं अपनी खबर आज ॥

एक दिन था कि, मुझे पृथ्वी ही नहीं—स्वर्ग तक की बात मालूम थी ; पर आज मुझे अपनी भी खबर नहीं कि हूँ या नहीं हूँ । बेखबरी ! तेरा भला हो । प्यारीकी जुदाई की वजहसे अजब बेखबरी—बेहोशी छाई हुई है ।

बेकसी सदमये हिज्राँकी मुझे ताव नहीं ।

काश दुश्मन ही चले आयें जो अहबाव नहीं ॥

एक तो विरहका दुःख और उस पर विजनता ; बताइये, किस तरह कोई दुःख उठाये । मैंने माना कि, मेरे मित्र नहीं हैं, जो आकर मुझे धीरज दें ; पर शत्रु तो हैं, वही चले आवे ; जिससे विजनता तो किसी तरह कम हो ।

सब्र आना तो मुहब्बतमें, बहुत मुश्किल है ।

मौत भी तो नहीं इसको, वह काफिर दिल है ॥

प्रेममें धीरज आना तो बहुत कठिन है । इस काफिर दिलको


आलमेबाला=स्वर्ग । बेकसी=मजबूरी । सदमये=तकलीफ । हिज्राँ=विशोग । काश=खुदा करे । अहबाव=मित्र ।