शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४६ )
ऐसी ही बात महाकवि कालिदासने “शृङ्गार-तिलक” में कही है :—
अपूर्वो दृश्यते वह्निः, कामिन्याः स्तनमण्डले ।
दूरतो दहते गानं, हृदि लभस्तु शीतलः ॥
कामिनीके स्तनमण्डलोंमें अपूर्व अग्नि है, जो दूरसे तो शरीर को जलाती है और हृदयसे लगाने पर शीतल हो जाती है ।
मतलब यह है कि, स्त्री स्मरण करनेसे सन्ताप करती, देखनेसे चित्तको हर लेती और मनुष्यको अन्ध्या बना देती, छूनेसे बल नाश करती, सम्भोग करनेसे वीर्यका नाश करती और नेत्रोंके सामनेसे हटने पर विरहाग्निमें जलाती है । स्त्री से किसी तरह भी पुरुषको सुख नहीं । स्मरण करनेमें सुख, न देखनेमें सुख ; छूनेमें सुख, न भोगनेमें सुख ; पास रहनेमें सुख, न अलग होनेमें सुख । फिर भी लोग स्त्री पर जान देते हैं, यह क्या कम आश्चर्यकी बात है ?
वियोगिण्योके सम्बन्धेम् उर्द्वं कवियोंकी उत्पत्तिः ।
प्राणप्यारी स्त्री अथवा आश्रानाकी जुदाईमें पुरुष पागल सा हो जाता है । उसके शरीरमें धून और मांसका नाम नहीं रहता —हुड़ोंका कड़ाल रह जाता है । जिन्दगी भार मालूम होती है । विरही पुरुष हर क्षण मौत को याद करता है ; पर मौत भी, उस विपत्तिके समयमें, उससे चैर सा कर लेती है । यहाँ