भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( २५४ )

क्या पूछते हो हमारा दिल खुश है या नाखुश ? हमें तो यह भी खबर नहीं कि, वह है भी या नहीं।

बिरहकी रातका वर्णन उस्ताद जौफ़ने खूब किया है। उसका ज़रासा नमूना हम देते हैं ; जिन्हें सबका आनन्द लेना हो, वे हरिदास एण्ड कंपनी, कलकत्ता, से "उस्ताद जौफ़" मँगा देखें।

कहूँ क्या जौफ़ बहवाले शबे हिज्र।

कि थी एक-एक वडी सौ-सौ महीने ॥१॥

कहा जी ने मुझे यह हिज्र की रात।

यकी है सुबह तक देगी न जीने ॥२॥

दे जौफ़ ! बियोग-जुदाईकी रातका हाल क्या कहूँ ? एक-एक वडी सौ-सौ महीने सौ मालूम होती थी।

दिलने कहा कि, यह बियोग की रात है। निश्चय है, कि यह सबेरे तक ज़िन्दा न रहने देगी।

महाकवि नज़ीर की शायरीकी बानगी भी देख लीजिये—

किया जो यारने हमसे पयाम रखसतका।

तो दम निकल गया सुनते ही नाम रखसतका ॥

यारने जो हमसे विदाई की बात छेड़ी, तो विदाईका नाम सुनते ही हमारा दम निकल गया।

हाथ मुँह धोकर मसजिदमें जा नमाज़ पढ़ते हैं। अर्ज़ा—र्गा। ब्राद—खुश। इर्ज़ा—रुज्जीदा।

शबे हिज्र—बियोग की रात। पयाम—पैगाम। रखसत—विदाई, बुहो।

( २५५ )

अब जरा विरही की कमजोरीके नमूने भी मुलाहिजा फ़र- माइये :—

मुफ़्त जुल्फ़के मारेको ज़ज़ीर मत पिन्हाओ ।

काफ़ी है मेरी क़ैदको एक मकड़ीका जाला ।

मुफ़्त जुल्फ़के मारे को ज़ज़ीर मत पहनाओ । मेरे बदनमें जरा भी दम नहीं । मैं जुदाईके कष्ट उठाते-उठाते एकदम दुर्बल हो गया हूँ । मेरे क़ैद करनेके लिये एक मकड़ीका जाला ही काफ़ी है ।

और भी :—

ये नातवाँ कि आया जो यार मिलनेको ।

तो सूरत उसकी, उठाकर पलक न देख सका ।

यार की जुदाईमें ऐसा कमज़ोर हो गया हूँ कि, जब यार मुफ़्त से मिलनेकी आया, तो मैं पलक उठाकर उसकी सूरत तक न देख सका ।

कहिये पाठक ! अब तो आप न देख लिया कि, प्यारीकी जुदाईमें वियोगी पुरुषोंकी क्या दुर्दशा होती है । जब तक स्त्रियाँ सामने रहती हैं, तभी तक सामने स्वर्ग दीखता है ; उनके नज़रोंकी ओट होते ही प्राण निकलने लगते हैं—मृत्यु- कालसे भी अधिक वेदना होती है ।

कुलुक—लट ।

सुवना—यदि ऐसी-ऐसी शेरों और गज़लोंका आनन्द लूटना चाहते हैं ; तो श्रीमाल पण्डित ज्वालादेवजी शर्मा कृत “उस्ताद ज़ौक”, “महाकवि

( २५६ )

दोहा ।

जौलों सन्मुख नयनके, श्रबला श्रमृत-रूप ।

दूर भये ते सहज ही, होय यही विष-कूप ॥७४॥

सार—स्त्री सामने हो तो श्रमृत है, पर दूर हो तो विष है ।

74. A woman is like nectar so long as she is in front of the eyes. She becomes more painful than poison when removed from before the eyes.

दाग" और "महाकवि गालिब" हरिदास पगड कम्पनी, कलकत्ते से मांगावे । पयित्तजी उर्दू-कवियों पर आशोचनात्मक लेख मिलनेमें सिद्धहस्त हैं । हमने ये कविताएँ आपही की पुस्तकोंसे उद्धृत की हैं । बाबू रघुराज सिंह जी-५० के लिये महाकवि नज़ीर से भी हमने कुछ शेर ली हैं । उर्दू कवि-वचन-मालाके ये चारों दाने प्रत्येक हिन्दी जाननेवालेके देखनेकी चीज़ हैं । इन कवियोंकी एक-एक कविता ब्राह्मों रुपयेमें भी सस्ती है । लेखक महा- शयोने उर्दू न जानने वालोंके उभौतेके लिये, प्रत्येक कविताका हिन्दी अनु- वाद भी साथ-साथ कर दिया है । इन पुस्तकोंकी पबलिक ने अच्छी कदमी है । जिन हिन्दी-प्रसियोंने ये पुस्तके नहीं देखी हैं, वे इनके लिये ३१) मूल्य और ॥१॥ पोर्टेज—कुल ४ ) का लोभ न करें । ये सब आवेहयात या सुधारस का आनन्द देने वाली पुस्तके हैं । वहमी सज्जन वहममें गोते न लगावे, सूचनाको भूटी न समझें, इसीसे नीति, वैराग्य और श्रद्धा—इन तीनों शतकोंमें ही हमने मौके-मौकैसे इनके अधिक नमूने दिये हैं । जिन्होंने किसी मित्रके पास "नीतिपातक" और "वैराग्यपातक" देखे, उन्होंने जी जानसे मुग्ध होकर ये दोनों शतक तो माँगाये ही ; पर साथ ही "दाग" "गालिब" "ज़ौक" और "नज़ीर" भी माँगाये बिना न रहे ।

( २५७ )

नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्त्वा नितम्बिनीम् ।

मैवामृतलता रक्ता विरक्ता विषवल्ली ॥७५॥

मुन्दरी नितम्बिनीका छोड़कर न और अमृत है न विष । स्त्री अगर अपने प्यारको चाहे तो अमृतलता है और जब वह उसे न चाहे, तो निश्चय ही विषकी मन्जरी है ॥७५॥

खुलासा—इस जगत्में स्त्री ही अमृत है और स्त्री ही विष है । जब वह अपने आशिकको चाहती है, तब तो अमृत सी दीखती है और वही जब अपने आशिक से नाराज़ हो, उसे नहीं चाहती, तब विष हो जाती है । इस बातको पुरुषमात्र आसानी से समझ सकते हैं । स्त्री जब अपने प्यारको प्यार करती है, तब उसका प्यारा उसपर जी-जान निछावर करता है ; उसके इशारेपर कठपुतलीकी तरह नाचता है ; पर ज्योंही वह अपने चञ्चल स्वभाव-अनुसार उसे छोड़ दूसरेको चाहने लगती है ; त्योंही उसका वही प्यारा, उसे विषसी समझ कर, उसके प्राण-नाश पर भी उतारू हो जाता और अपनी भी जान दे देता है ।

“पञ्चतन्त्र”में भी लिखा है :—

• नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्त्वा नितम्बिनीम् ।

यस्याः संगेन जीव्येत द्वियेत च वियेगगतः ॥

स्त्रीके सिवा अमृत और विष दूसरी कोई चीज़ नहीं है ;

१७

( २५८ )

क्योंकि उसके सङ्गसे प्राणी जीता और उसके वियोगसे मरता है।

“भामिनी-विलास”में भी लिखा है :—

श्यामं सितं च सुदृशो न दृशोः स्वरूपं

किं तु स्फुटं गरलमेतदधामृतं च ॥

नो चेतकथं निपतनादनयोस्तदैव

मोहं मुदं च नितरां दधते युवानः ॥

सुलोचना स्त्रीकी आँखोंमें जो श्यामता और शुभ्रता—कलाई और सफेदी दीखती है, वह कलाई और सफेदी नहीं है ; किन्तु विष और अमृत है। यदि यह बात न होती, तो युवा पुरुष उसकी नज़र-से-नज़र मिलते ही मोहित और आनन्दित न होते।

स्त्रीकी आँखोंमें जो श्यामता या कलाई है, वह विष है और जो शुभ्रता या सफेदी है, वह अमृत है। जिसे वह खूब होकर अमृत की नज़रसे देखती है, उसे परम आनन्द होता है और जिसे वह नाराज़ होकर विषकी नज़रसे देखती है, उसे मोह या दुःख होता है। क्या खूब कहा है ! वाह ! पण्डितराज वाह !

दाहा ।

नहीं विष नहीं अमृत कहूँ, एक तिया तू जान ।

मिलवे में अमृत-नदी, विछुरे विषकी खान ॥७५॥

( २५६ )

सांर—स्त्रीही अमृत और स्त्री हो विष है । जब वह चाहे तब तो अमृत है और जब न चाहे तब विष है ।

75. There is no better nectar than a woman and no worse poison than a woman also. If she is loving, she is a creeper of nectar, but if she forsakes, she is verily a creeper of poison.

—*—

आवर्तः संशयानामविनयभवनं पतनं साहसानाम् ।

दोषाणां सन्निधानं कपटशतमयं क्षेत्रमग्रत्वयानाम् ॥

स्वर्गद्वारस्य विघ्नो नरकपुरमुखं सर्वभायाकरगडम् ।

स्त्रीयन्वं केन सृष्टं विषममृतमयं प्राणिनां मोहपाशः ॥७६॥

सन्देहोंका भँवर, अविनयका घर, साहसोंका नगर, पाप- दोषोंका खजाना, सैकड़ों तरहके कपट और अविश्ववासका क्षेत्र, स्वर्ग-द्वारका विघ्न, नरक-नगरका द्वार, सारी मायाओंका पिठारा, अमृतके रूपमें विष और पुरुषोंको मोह-जालमें फँसाने वाला स्त्री- यन्त्र न जाने किसने बनाया ?

सुन्दरी स्त्रियाँ ऊपरसे गोरी पर भीतरसे काली होती हैं । इनका शरीर फूलकी तरह कोमल और कमनीय होता है, पर इनका हृदय वज्रवत् कठोर होता है । ये दान, मान, सेवा, अस्त्र और शस्त्र किसीसे भी वशमें नहीं होतीं । न कोई इनको

( २६० )

प्यारा है और न कोई कुप्यारा । इनका स्वभाव है कि, ये नये-नये पुरुषोंकी अभिलाषा किया करती हैं । लज्जा, नीति, चतुराई और भयके कारणसे ये सती नहीं बनी रहतीं, केवल चाहने वाला न मिलने या मौका हाथ न आनेसे ही ये सती बनी रहती हैं । असत्य, साहस, माया, मत्सरता और लोभ,—इनमें स्वभावसे ही होते हैं । पुरुषोंसे इनमें दूनी श्रुधा, चोगुनी शर्म, छेगुनी हिम्मत या बुद्धि होती है और कामदेव तो अठ गुना होता है । जब ये अपनी बराबर बालियोंके साथ एकान्तमें बैठती हैं, तब कहा करती हैं :—“अहो, वेश्याए बड़ा आनन्द करती हैं ; वे स्वतन्त्रता-पूर्वक नये-नये पुरुषोंको भोगतीं और इच्छानुसार उनका धन खर्च करती हैं ।” अथवा कोई-कोई कहती हैं :—“मेरा मर्द तो पशु है । भोग-विलासकी बातें तो जानता ही नहीं । संभा होते ही भैंसकी तरह पड़ जाता है । मैंने इसका हाथ पकड़ कर कुछ भी सुख न पाया । देख ! फलानीका पति कैसा छेल छबीला नटनागर है इत्यादि ।” जो पुरुष इनकी खूब श्रुधामद करता है, इनकी फरमायशोंको ज्वान से निकलते ही पूरी करता है—साथ ही रूपवान, विद्वान, धनवान और गुणवान होता है, उसे छोड़ कर ये महा धूर्ता नीच और अधमके साथ चली जाती हैं । कोई पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं :—“A woman in love is very poor judge of character.” ली जिसे चाहती है या जिससे आशनाई करती है, उसके चरित्र की परख नहीं करती । कहा है—

( २६१ )

गुणाश्रयं कीर्तयितुं च कान्तं, पतिरतिष्ठि सधने युवानम् ।

विहाय शीघ्रं वनिता ब्रजन्ति, नरान्तरं शीलगुणादिहीनम् ॥

गुणाधार, कीर्तिमान्, सुन्दर, रतिक्रीड़ा-कुशल, धनवान् और जवान पुरुष को भी त्यागकर स्त्रियाँ नीच, निर्गुण और कुरूपके साथ चली जाती हैं ।

दुष्टा स्त्रियाँ मिथ्या विलास-चिह्न दिखाकर अपने पतिको पागल रखती हैं और उससे पैर तक दबवाती हैं । एकको नेत्र-विकारोंसे रिभाती हैं ; दूसरेके साथ बचन-विलास करती हैं, तीसरेको चेष्टाओंसे प्रसन्न करती हैं और चौथेको मोहमें फँसाती हैं । स्त्रियाँ बहुलपिणी हैं । जब यह कामवती होती है और पर-पुरुषसे मिलती है, तब ऐसे-ऐसे छलबल और कौशल करती है, कि चतुर-से-चतुर पुरुषकी भी अकूल काम नहीं करती । उस समय, ज़रूरत होनेसे, ये अपने पति-पुत्र और पिता-माता तक की हत्या कर सकती* हैं । खीके मनमें क्या है, वह कब क्या करेंगी,

ॐ संसारमें ऐसा कौनसा नीचे-से-नीचा काम है, जो इस प्रेमके कारब नहीं करना पड़ता ? प्रेम-पत्न्य के पथिकों को ज्ञात-पति तो क्या बीज़ है, अपने प्यारे माता-पिता, बहन-भाई और अपनी झीलाइं तकसे मुँह मोड़ना और माता तोड़ना पड़ता है । अभी हाल ही में सुना है कि, हमारे एक परिचितकी बेवा बहन अपने प्यारे, ब्यांखीके तारे, पासे-पनासे दो पुत्र-खलोंको छोड़, एक यवनके साथ भाग गई । किसीने ठीक ही कहा है :—

Cruel love ! what is there to which thou dost not drive mortal

( ३६२ )

इन बातोंका जानना बड़ा कठिन है। लोकमें कहावत भी मशहूर है—“त्रिया चरित्र जाने नहीं कोई, खसम मार कर सती होई।” शास्त्रोंमें भी कहा है—

रूपस्य चित्तं कृपणस्य चित्तं, मनोरथं दुर्जनमानवानाम् ।

स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ॥

राजाके चित्त, स्रमके धन, दुर्जनके मनोरथ, स्त्रीके चरित्र और पुरुषके भाग्य की बात, देवता भी नहीं जानते, मनुष्य बेचारा कौन चीज़ है ?

ल्लियोके संशयोंका भँवर, साहसोंका नगर और नाना प्रकार की माया और अविश्वासका पिटारा होनेमें ज़रा भी सन्देह नहीं। जो इनका विश्वास करते हैं, वे बुरी तरह मारे जाते हैं। इसलिये बहुत पुरुषोंको ल्लियोका विश्वास भूल कर भी न करना चाहिये। इनसे सदा सावधान और सतर्क रहना चाहिये। जितनी विद्या

hearts.” ऐ निदयी प्रेम ! संसारमें ऐसा क्या है, जिसे करने पर तु मनुष्यों को विषय नहीं करता ?

† धेकरने कहा है :—“I think women have an instinct of dissimulation ; they know by nature how to disguise their emotions far better the most than the most consummate male courtiers can do. मेरे बिचार में, स्त्रियों में कपटाचार स्वाभाविक होता है। नितान्त काव्य-कुशल राज-सभासदोंको अपेक्षा भी वे अपने भावोंको अधिक उत्तमताने छिपा सकती हैं। स्त्रियाँ अपनी बातको जितनी श्रद्धा सह छिपा सकती हैं, और कोई नहीं छिपा सकता।

( २६३ )

शुक्र और बृहस्पतिमें है, उतनी तो इनमें सम्भावसे ही होती है॥

शास्त्रकारोंने कहा है :—

नदीनांच नखीनांच, शृंगिणां शत्रुपाणिनाम् ।

विश्ववासो नेव कर्तव्यः, व्रीणु राजकुलेषु च ॥

नदीका, नाखु नवाले जानवरोंका, सींग वाले पशुओंका, हथियार बाँधनेवालों का, स्त्री का और राजा का विश्वास कभी न करना चाहिये ।

“श्री शङ्कराचार्यजी ने अपनी” “प्रश्नोत्तर मालामें” भी कहा है—विश्वासपात्र न किमस्ति ? नारी । अर्थात् कौन विश्वासयोग्य नहीं है ? स्त्री । इतने सब औगुणोंके सिवा; यह पुरुषकी मोक्ष-प्रतिमें भी वाध्यास्वरूप है । इसकी तिरछी नज़रके तले पड़नेसे ही पुरुष इसका दास हो जाता है और ऐसा दास हो जाता है कि, फिर पीछा नहीं छूटता । जवानीमें तो इसे छोड़नेका आप ही जी नहीं चाहता । जब कुछ बिरक्ति होने लगती है, तब इसकी ओलाहमें मन फँस जाता है । ज्ञानका उदय होने पर भी, पुरुष विचारने लगता है, अगर मैं स्त्री-बालकोंको छोड़ कर वनमें

† लेखिन्न महोदय कहते हैं :—“There are certain things in which a woman's vision is sharper than a hundred eyes of the males.” कुछ ऐसी भी बातें हैं, जिनमें स्त्री की नज़र पुरुषोंकी सौ आँखोंसे तेज़ होती है ।

( २६४ )

चला जाऊँगा, तो इनका लालन-पालन कौन करेगा ? मेरे न रहनेसे इनको असुक कष्ट होगा, इन पर असुक आफत आयेगी। अच्छा तो, लड़के लड़कियोंकी शादी-विवाह करके बनको चला जाऊँगा और तभी भगवानका भजन करूँगा।’ इस तरह वह विचारही करता रहता है कि, मौत आ जाती है और उसके विचार धरे-के-धरे रह जाते हैं। ठीक उस तौतेका सा हाल होता है, जो मनमें विचार कर रहा था कि, आदमी हट जाय, तो मैं पिंजरेसे निकल भागूँ। आदमी हटे, तोता निकलनेकी चेष्टा करने लगा कि, एक काल सपने आकर उसे अपना भोजन बना लिया।” स्त्री के सम्बन्धमें महात्मा कबीर कहते हैं :—

नारी कहूँ कि नाहरी, नख सिख सो यह खाय । जल बूड़ा तो ऊबै, भग बूढ़ा बहि जाय ॥ नैनो काजल पायके, गाढ़ा बाँधे केश । हाथों मेंहदी लायके, बाधिन खाया देश ॥

छप्पय ।

परम भवन को भौर, भवन है गूढ़ गरव को । अनुचित कृत को सिन्धु, कोष है दोष अबरको । प्रगट कपटको कोट, खेत अशीति करनको । सुरपुरको बंटमार, नरक पुर द्वार करनको ।

( २६५ )

यह युवती-यन्त्र कौन रच्यो, महा अमृत-विषको भ्रम्यो ? थिर चर नर किबर सुर असुर, सवके गल-वन्धन कर्यौ ॥७६॥

सार—स्त्री बड़ा ज्वर्दस्त जाल है। फिर भी लोग इसमें जोकर फँसते और बड़े खुश होते हैं, यह आश्चर्य्यकी बात है। इसमें एक बार फँसने पर, इससे निकलना कठिन है।

76. Who has created this machine in the form of woman who is the very seat of doubts, the house of insolence, the city of courage, the object of vices, the field of misbelief, full of hypocrisy, the obstructor to the gates of heaven, and the very gate of the city of hell, the basket of delusion, the poison in the garb of nectar and the snare for catching men ?

—*—

सत्यत्वेन शशांक एष वदनीभूतो नेवेन्दीवर- इन्द्रे लोचनतां गर्तं न कनकैरप्यंगयिष्ठः कृता ॥ किन्त्वैवंकविभिः प्रतारितमनास्तत्त्वं विज्ञानन्पि त्वङ्मांसास्थिमयं वपुर्मुगद्वां मन्दो जनः सेवते ॥७७॥

अगर हमसे पक्षपात-रहित सच्ची बात पूछी जाय, तो हमको कहना होगा कि, चन्द्रमा लीला सुख नहीं, कमल उसके नेत्र नहीं ; उसका भी शरीर और सब प्राणियोंकी तरह हाड़, चाम और मांसका

( २६६ )

है । इस बातको जानकर भी, कवियोंकी मिथ्या उत्पत्तियोंके मुलावेमें पड़कर, हमलोग स्त्रियोंपर आसक्त रहते और उन्हें सेवन करते हैं ॥७७॥

खुलासा—जिस तरह संसारके और प्राणियोंके शरीर हाड़, मांस और रक्त प्रभृतिसे बने हैं ; उसी तरह स्त्रियोंके शरीर भी इन्हीं पदार्थोंसे बने हैं, इस बातको हम लोग जानते हैं ; पर कवियोंके झूठे वद्यों में आकर, हम लोग भी उनके मुखको चन्द्रमा, नयनों को कमल और देह को सुवर्ण-निर्मित समझ कर उन पर मरे मिटते हैं । यह हमारी बड़ी भारी गलती है ।

वैराग्यपत्र ।

भला कहाँ पीयूष-निधि चन्द्रमा और कहाँ स्त्रियोंका कफ, थूक और खराबसे भरा मुँह ? कहाँ भगवानके हाथमें विराजने-वाला सुदर्शनीय कमल और कहाँ गन्दे पदार्थोंसे बने स्त्रियोंके नेत्र ? कहाँ सूर्यकी सी आभा वाला सुवर्ण और कहाँ हाड़, चाम और मांससे बने स्त्रियोंके शरीर ? सब बात तो यह है कि, हम नरक के कीड़ोंका सा आवरण करते हैं । नरक के कोई मल मूत्र राघ लोह प्रभृति गन्दे पदार्थोंमें रमते और सुखी रहते हैं । हम भी उन्हींको तरह हाड़, चाम, मांस, राघ, खून और मलमूत्र प्रभृतिके भण्डारमें रमण करते और अपने तर्ज भाग्यवान् समझते हैं ; हम में और नरकके कीड़ोंमें कोई भेद है कि नहीं, यह बात जरा विचार करनेसे ही समझमें आजायगी ।

( २६७ )

कुण्डलिया ।

नहिं शशांक-सन वदन तित्य, नील जलज सम-नैन । अंग कनक-सम है नहीं, कोकिल-सम नहिं बैन । कोकिल-सम नहिं बैन, भूष कवि उपमा दीन्ही । जानत हैं सब भेद, तज पट आश्विन कीन्ही । हाड चाममय नार, मन्दमति निशिदिन सेवहिं । करै उपाय अनेक, रत्नानि चित नैक न देवहिं ॥७७॥

सार—सब प्राणियोंकी तरह-स्त्रियोंका शरीर भी हांड, चाम और मांस का है। उन्हें चन्द्रमुखी, कमल-नयनी और सुवर्णकी सी कान्तिवाली समझना सरासर मूल है।

77. In reality neither the moon has transformed itself into the face of a woman nor the lotus has turned itself into her eyes, nor is her body made up of gold; knowing all these facts however but being deceived by the false analogy of the poets, senseless people indulge in the body of woman which consists of skin, flesh and bones.

—*

लीलावतीनां सहजा विलास- स्त एव मृदय्य हृदि स्फुरन्ति ॥

( २६८ )

रागो नविन्या हि निर्मर्गसिद्धः

स्त्वत्र अमत्येव मुथा पर्वत्रिः ॥७८॥

जिस तरह मूर्ख औरों कमलिनीकी स्वाभाविक ललाईको देखकर उसपर मुग्ध हो जाता और उसके चारों ओर गूंजता फिरता है ; उसी तरह मृदु पुरुष लीलावती स्त्रियोंके स्वाभाविक हाव-भाव और नाज़-नखरोंको देखकर उनपर मुग्ध हो जाते हैं ॥७८॥

खुलासा—कमलिनियोंमें जो एक प्रकारकी सुखी होती है, उसे औरों प्यारकी निशानी समझता है और इसीलिये उस पर आश्रित होकर उसके चारों ओर गूंजता हुआ घूमता करता है। कमलिनीकी तरह नवयौवना स्त्रियोंमें भी विलास—हाव-भाव और नाज़-नखरे स्वभावसे ही होते हैं ; पर अज्ञानी लोग उनके हाव-भावोंको देखकर मनमें समझते हैं कि, ये स्त्रियाँ हमें चाहती हैं ; पर असलमें वे चाहती-वाहती नहीं, हाव-भाव दिवाना तो उनका स्वभाव है। उनके हावभावोंको प्यारके चिह्न समझना महामूर्खता है। स्त्रियोंको पुरुषोंको तड़पते देखनेमें भी एक प्रकारका मजा सा आया करता है ; इसीलिये चञ्चल स्त्रियाँ जहाँ पुरुषोंको देखती हैं, वहाँ नाज़-नखरे किया करती हैं और जब उनका शिकार मछली की तरह तड़पता है, तब मनमें बड़ी खुश होती हैं।

दोहा ।

कामिनि बिलसत सहजमें, मूरख मानत प्यार ।

सहज सुगन्धित कुसुमिनि, औरा भ्रमत गँवार ॥७८॥

( १६६ )

सार—लोलावती चंचल स्त्रियों के हाव-भाव और नाज-नख़रों को मुहव्वतकी निशानी समझना नादानी है। यह तो उनका स्वभाव है।

78. The amorous plays of sportful women are quite natural to them but they arouse passion in the hearts of foolish men, just as a black bee hovers over a lotus being attracted by its redness which is natural to it.

—*

यदेतत्पूर्णेन्दुयुतिरसुदाराकृतिभं—

मुखाब्जं तन्वंगाः किल वसति यत्राधरमधु ।

इदं तावत्याकुटुम्बफलविवातीविरसं—

व्यतीतेऽस्मिन्काले विषमिव भविष्यत्यसुखदम् ॥७६॥

स्त्रीका पूर्णिमाके चन्द्रमाकी छविको हरनेवाला कमलसुख, जिसमें अधरामुत रहता है, मन्दारके फलकी तरह अज्ञात या यौवनावस्था तक ही अच्छा मालूम होता है ; समय बीतने यानी बुढ़ापा आने पर, वही कमल-सुख अनारके पके और सड़े फलकी तरह विष सा हो जाता है ॥७६॥

•खुलासा—जिस तरह अनारका फल अपने समयमें अमृत का मज़ा देता है, पर समय निकल जाने पर बर्ज़ायके और कड़वा हो जाता है ; उसी तरह स्त्रीका पूर्णोके चाँदको शामाने

( २७० )

वाला कमल सा मुह उठती जवानी या भर-जवानीमें ही अमृत सा रहता है । जवानी दीवानीके जाते ही, वह सड़े हुए अनारके फलकी तरह निकम्मा और विषसा हो जाता है ; क्योंकि बुढ़ापा आते ही दाँत गिर जाते हैं, गाल पिचक जाते हैं, चमड़ेमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और सुखों चली जाती हैं । बेकन महोदय कहते हैं—Beauty is as summer fruits which are easy to corrupt and can not last. सौन्दर्य्य श्रीष्म ऋतुके फलोंके समान है, जो जल्दी ही सड़ जाते और अधिक समय तक नहीं उहर सकते ।

दोहा ।

अथर मधुर मधु सहित सुख, हूतौ सबन शिरमौर ।

सो अब बिगरे फलन-सम, भयौ और सो और ॥७६॥

सार—स्त्रीको सारी शोभा जवानीमें ही ह । जवानी गई, फिर कुछ नहीं ।

79. The beautiful lotus-like face of a woman that surpasses the beauty of the full-moon having honeyed lips in it is very pleasant in young age only but when that time is past it becomes painful like poison just like the fruit of Mandara.

—*—

उन्मीलत्रिवलीतरङ्गनिलया प्रोत्तुङ्गपीनस्तन-

दन्देनोयतचकवाकमिथुना वक्रान्धुजोद्गासिनी ॥

( २०१ )

कान्ताकारधरा नदीयमभितः कूराशयानेज्यते

संभाराएविमञ्जनंयदितोद्रेणसंलज्यताम् ॥८०॥

खुलासा—स्त्री एक नदी है। उसके पेट पर जो त्रिवर्लीके समान तीन रेखासी हैं, वही उस नदीकी लहर हैं, उसके दोनों कठोर कुच चकवेके जोड़े हैं और उसके जो कूर अभिप्राय हैं, वही भँवर हैं—जिस तरह और नदियाँ समुद्रमें जाकर गिरती हैं; उसी तरह स्त्री-नदी भी संसार-सागरमें जाकर गिरती है। जिस तरह और नदियोंमें गिरी हुई चीज़ नदीके प्रवाहके साथ चलती हुई समुद्रमें जा पड़ती है; उसी तरह स्त्री-नदीमें गिरी हुई वस्तु भी संसार-सागरमें जा पड़ती है। जो पुरुष इस स्त्री-नदीमें स्नान या क्रीड़ा प्रभृति करते हैं, वे उसके तेज बहावमें चलते-हुए संसार-सागरमें जा पड़ते हैं। समुद्रमें गिरे बाद बचना कठिन हो जाता है, इसलिये जो पुरुष संसार-सागरमें दूबनेसे बचना चाहें, वे स्त्री-नदीसे दूर रहें। इस भयङ्कर नदीके पास भी न जायँ। इस स्त्री-नदीका जोर साधारण नदियोंकी अपेक्षा बहुत अधिक है। और नदियोंमें तो वही डूबता है, जो उनके अन्दर घुसता या पैर देता है; पर स्त्री-नदी तो सामने आये हुए पुरुषको अपने बलसे, अजगरकी तरह, भीतर खींच लेती और फिर उसे संसार-सागरमें लेजा पटकती है। “भामिनी विलास”-कस्तु पण्डितवर जगन्नाथ महाराजने और ही तरह रूपक वाँचा है। उसका आशय कुछ और है, फिर भी उसका रसा-स्वादन कीजिये :-

( २७२ )

रूपजला चलनयना नाभ्यावर्तांकचावलि भुजंगा ।

मज्जनन्तियत्र सन्तः सेयं तहूषी तर्हगिष्यी विषमा ॥

रूप ही जल है, चंचल नयन मछलियाँ हैं, नामि भँवर है और सिरके बाल सर्प हैं—यह तरुण स्त्री रूपी नदी दुस्तर नदी है । इस नदीमें शृं गारशास्त्र-प्रवीण सज्जन ज्ञान करते हैं ।

महाकवि कालिदासके एक रूपकका भी रस आखादन कीजिये । उसमें कुछ और ही मज़ा है :—

वाहू द्वौ च मृणालमास्यकमलं, लावण्यलीलाजलं,

श्रोषी तीर्थशिला च नेत्रशफरी, धर्मिमल शैवालकम् ।

कान्तायाः स्तन चक्रवाक युगलं, कन्दर्पवाणानलैर्दग्ध-

नामवगाहनाय, विधिना रम्यं सरो निर्मितम् ॥

ब्रह्माने कामदेवके वाणोंकी अग्नि-ज्वालासे जलते हुए पुरुषों के ज्ञान करनेके लिये स्त्री रूपी सुन्दर तालाब बनाया है । इस तालाबमें क्या-क्या चीज़ें हैं ? इस तालाबमें स्त्रीकी दोनों भुजायें तो कमलकी डंडी हैं, उसका मुँह कमल है, उसके लावण्यका विलास जल है, कमर उतरनेकी सीढ़ी है, उसके नेत्र मछलियाँ हैं, उसके बँधे हुए केश—बाल सिवार हैं और दोनों स्तन चक्रवाकके जोड़े हैं ।

इसमें कोई शक नहीं, कि कन्दर्प-तापको स्त्रीके पयोधर—कुच ही शान्त करते हैं । शरीरमें कामवाणोंकी ज्वाला उठने पर, स्त्री ही उस ज्वाला को शान्त करती है ; पर बीमार होकर

चित्र: कल्पलता का तिदरी में आगमन — बिखरे केश और अस्त-व्यस्त वस्त्रों का दृश्य।

( १७ ) कल्पलता बाहर की तिदरी में आकर खड़ी है ; उसके सिर के बाल बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है ।