भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २६४ )

चला जाऊँगा, तो इनका लालन-पालन कौन करेगा ? मेरे न रहनेसे इनको असुक कष्ट होगा, इन पर असुक आफत आयेगी। अच्छा तो, लड़के लड़कियोंकी शादी-विवाह करके बनको चला जाऊँगा और तभी भगवानका भजन करूँगा।’ इस तरह वह विचारही करता रहता है कि, मौत आ जाती है और उसके विचार धरे-के-धरे रह जाते हैं। ठीक उस तौतेका सा हाल होता है, जो मनमें विचार कर रहा था कि, आदमी हट जाय, तो मैं पिंजरेसे निकल भागूँ। आदमी हटे, तोता निकलनेकी चेष्टा करने लगा कि, एक काल सपने आकर उसे अपना भोजन बना लिया।” स्त्री के सम्बन्धमें महात्मा कबीर कहते हैं :—

नारी कहूँ कि नाहरी, नख सिख सो यह खाय । जल बूड़ा तो ऊबै, भग बूढ़ा बहि जाय ॥ नैनो काजल पायके, गाढ़ा बाँधे केश । हाथों मेंहदी लायके, बाधिन खाया देश ॥

छप्पय ।

परम भवन को भौर, भवन है गूढ़ गरव को । अनुचित कृत को सिन्धु, कोष है दोष अबरको । प्रगट कपटको कोट, खेत अशीति करनको । सुरपुरको बंटमार, नरक पुर द्वार करनको ।