भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 310

( २६३ )

शुक्र और बृहस्पतिमें है, उतनी तो इनमें सम्भावसे ही होती है॥

शास्त्रकारोंने कहा है :—

नदीनांच नखीनांच, शृंगिणां शत्रुपाणिनाम् ।

विश्ववासो नेव कर्तव्यः, व्रीणु राजकुलेषु च ॥

नदीका, नाखु नवाले जानवरोंका, सींग वाले पशुओंका, हथियार बाँधनेवालों का, स्त्री का और राजा का विश्वास कभी न करना चाहिये ।

“श्री शङ्कराचार्यजी ने अपनी” “प्रश्नोत्तर मालामें” भी कहा है—विश्वासपात्र न किमस्ति ? नारी । अर्थात् कौन विश्वासयोग्य नहीं है ? स्त्री । इतने सब औगुणोंके सिवा; यह पुरुषकी मोक्ष-प्रतिमें भी वाध्यास्वरूप है । इसकी तिरछी नज़रके तले पड़नेसे ही पुरुष इसका दास हो जाता है और ऐसा दास हो जाता है कि, फिर पीछा नहीं छूटता । जवानीमें तो इसे छोड़नेका आप ही जी नहीं चाहता । जब कुछ बिरक्ति होने लगती है, तब इसकी ओलाहमें मन फँस जाता है । ज्ञानका उदय होने पर भी, पुरुष विचारने लगता है, अगर मैं स्त्री-बालकोंको छोड़ कर वनमें

† लेखिन्न महोदय कहते हैं :—“There are certain things in which a woman's vision is sharper than a hundred eyes of the males.” कुछ ऐसी भी बातें हैं, जिनमें स्त्री की नज़र पुरुषोंकी सौ आँखोंसे तेज़ होती है ।