भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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इन बातोंका जानना बड़ा कठिन है। लोकमें कहावत भी मशहूर है—“त्रिया चरित्र जाने नहीं कोई, खसम मार कर सती होई।” शास्त्रोंमें भी कहा है—

रूपस्य चित्तं कृपणस्य चित्तं, मनोरथं दुर्जनमानवानाम् ।

स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ॥

राजाके चित्त, स्रमके धन, दुर्जनके मनोरथ, स्त्रीके चरित्र और पुरुषके भाग्य की बात, देवता भी नहीं जानते, मनुष्य बेचारा कौन चीज़ है ?

ल्लियोके संशयोंका भँवर, साहसोंका नगर और नाना प्रकार की माया और अविश्वासका पिटारा होनेमें ज़रा भी सन्देह नहीं। जो इनका विश्वास करते हैं, वे बुरी तरह मारे जाते हैं। इसलिये बहुत पुरुषोंको ल्लियोका विश्वास भूल कर भी न करना चाहिये। इनसे सदा सावधान और सतर्क रहना चाहिये। जितनी विद्या

hearts.” ऐ निदयी प्रेम ! संसारमें ऐसा क्या है, जिसे करने पर तु मनुष्यों को विषय नहीं करता ?

† धेकरने कहा है :—“I think women have an instinct of dissimulation ; they know by nature how to disguise their emotions far better the most than the most consummate male courtiers can do. मेरे बिचार में, स्त्रियों में कपटाचार स्वाभाविक होता है। नितान्त काव्य-कुशल राज-सभासदोंको अपेक्षा भी वे अपने भावोंको अधिक उत्तमताने छिपा सकती हैं। स्त्रियाँ अपनी बातको जितनी श्रद्धा सह छिपा सकती हैं, और कोई नहीं छिपा सकता।

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