भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २६१ )

गुणाश्रयं कीर्तयितुं च कान्तं, पतिरतिष्ठि सधने युवानम् ।

विहाय शीघ्रं वनिता ब्रजन्ति, नरान्तरं शीलगुणादिहीनम् ॥

गुणाधार, कीर्तिमान्, सुन्दर, रतिक्रीड़ा-कुशल, धनवान् और जवान पुरुष को भी त्यागकर स्त्रियाँ नीच, निर्गुण और कुरूपके साथ चली जाती हैं ।

दुष्टा स्त्रियाँ मिथ्या विलास-चिह्न दिखाकर अपने पतिको पागल रखती हैं और उससे पैर तक दबवाती हैं । एकको नेत्र-विकारोंसे रिभाती हैं ; दूसरेके साथ बचन-विलास करती हैं, तीसरेको चेष्टाओंसे प्रसन्न करती हैं और चौथेको मोहमें फँसाती हैं । स्त्रियाँ बहुलपिणी हैं । जब यह कामवती होती है और पर-पुरुषसे मिलती है, तब ऐसे-ऐसे छलबल और कौशल करती है, कि चतुर-से-चतुर पुरुषकी भी अकूल काम नहीं करती । उस समय, ज़रूरत होनेसे, ये अपने पति-पुत्र और पिता-माता तक की हत्या कर सकती* हैं । खीके मनमें क्या है, वह कब क्या करेंगी,

ॐ संसारमें ऐसा कौनसा नीचे-से-नीचा काम है, जो इस प्रेमके कारब नहीं करना पड़ता ? प्रेम-पत्न्य के पथिकों को ज्ञात-पति तो क्या बीज़ है, अपने प्यारे माता-पिता, बहन-भाई और अपनी झीलाइं तकसे मुँह मोड़ना और माता तोड़ना पड़ता है । अभी हाल ही में सुना है कि, हमारे एक परिचितकी बेवा बहन अपने प्यारे, ब्यांखीके तारे, पासे-पनासे दो पुत्र-खलोंको छोड़, एक यवनके साथ भाग गई । किसीने ठीक ही कहा है :—

Cruel love ! what is there to which thou dost not drive mortal