शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 307, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६० )
प्यारा है और न कोई कुप्यारा । इनका स्वभाव है कि, ये नये-नये पुरुषोंकी अभिलाषा किया करती हैं । लज्जा, नीति, चतुराई और भयके कारणसे ये सती नहीं बनी रहतीं, केवल चाहने वाला न मिलने या मौका हाथ न आनेसे ही ये सती बनी रहती हैं । असत्य, साहस, माया, मत्सरता और लोभ,—इनमें स्वभावसे ही होते हैं । पुरुषोंसे इनमें दूनी श्रुधा, चोगुनी शर्म, छेगुनी हिम्मत या बुद्धि होती है और कामदेव तो अठ गुना होता है । जब ये अपनी बराबर बालियोंके साथ एकान्तमें बैठती हैं, तब कहा करती हैं :—“अहो, वेश्याए बड़ा आनन्द करती हैं ; वे स्वतन्त्रता-पूर्वक नये-नये पुरुषोंको भोगतीं और इच्छानुसार उनका धन खर्च करती हैं ।” अथवा कोई-कोई कहती हैं :—“मेरा मर्द तो पशु है । भोग-विलासकी बातें तो जानता ही नहीं । संभा होते ही भैंसकी तरह पड़ जाता है । मैंने इसका हाथ पकड़ कर कुछ भी सुख न पाया । देख ! फलानीका पति कैसा छेल छबीला नटनागर है इत्यादि ।” जो पुरुष इनकी खूब श्रुधामद करता है, इनकी फरमायशोंको ज्वान से निकलते ही पूरी करता है—साथ ही रूपवान, विद्वान, धनवान और गुणवान होता है, उसे छोड़ कर ये महा धूर्ता नीच और अधमके साथ चली जाती हैं । कोई पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं :—“A woman in love is very poor judge of character.” ली जिसे चाहती है या जिससे आशनाई करती है, उसके चरित्र की परख नहीं करती । कहा है—