शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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है । इस बातको जानकर भी, कवियोंकी मिथ्या उत्पत्तियोंके मुलावेमें पड़कर, हमलोग स्त्रियोंपर आसक्त रहते और उन्हें सेवन करते हैं ॥७७॥
खुलासा—जिस तरह संसारके और प्राणियोंके शरीर हाड़, मांस और रक्त प्रभृतिसे बने हैं ; उसी तरह स्त्रियोंके शरीर भी इन्हीं पदार्थोंसे बने हैं, इस बातको हम लोग जानते हैं ; पर कवियोंके झूठे वद्यों में आकर, हम लोग भी उनके मुखको चन्द्रमा, नयनों को कमल और देह को सुवर्ण-निर्मित समझ कर उन पर मरे मिटते हैं । यह हमारी बड़ी भारी गलती है ।
वैराग्यपत्र ।
भला कहाँ पीयूष-निधि चन्द्रमा और कहाँ स्त्रियोंका कफ, थूक और खराबसे भरा मुँह ? कहाँ भगवानके हाथमें विराजने-वाला सुदर्शनीय कमल और कहाँ गन्दे पदार्थोंसे बने स्त्रियोंके नेत्र ? कहाँ सूर्यकी सी आभा वाला सुवर्ण और कहाँ हाड़, चाम और मांससे बने स्त्रियोंके शरीर ? सब बात तो यह है कि, हम नरक के कीड़ोंका सा आवरण करते हैं । नरक के कोई मल मूत्र राघ लोह प्रभृति गन्दे पदार्थोंमें रमते और सुखी रहते हैं । हम भी उन्हींको तरह हाड़, चाम, मांस, राघ, खून और मलमूत्र प्रभृतिके भण्डारमें रमण करते और अपने तर्ज भाग्यवान् समझते हैं ; हम में और नरकके कीड़ोंमें कोई भेद है कि नहीं, यह बात जरा विचार करनेसे ही समझमें आजायगी ।