शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 304, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५७ )
नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्त्वा नितम्बिनीम् ।
मैवामृतलता रक्ता विरक्ता विषवल्ली ॥७५॥
मुन्दरी नितम्बिनीका छोड़कर न और अमृत है न विष । स्त्री अगर अपने प्यारको चाहे तो अमृतलता है और जब वह उसे न चाहे, तो निश्चय ही विषकी मन्जरी है ॥७५॥
खुलासा—इस जगत्में स्त्री ही अमृत है और स्त्री ही विष है । जब वह अपने आशिकको चाहती है, तब तो अमृत सी दीखती है और वही जब अपने आशिक से नाराज़ हो, उसे नहीं चाहती, तब विष हो जाती है । इस बातको पुरुषमात्र आसानी से समझ सकते हैं । स्त्री जब अपने प्यारको प्यार करती है, तब उसका प्यारा उसपर जी-जान निछावर करता है ; उसके इशारेपर कठपुतलीकी तरह नाचता है ; पर ज्योंही वह अपने चञ्चल स्वभाव-अनुसार उसे छोड़ दूसरेको चाहने लगती है ; त्योंही उसका वही प्यारा, उसे विषसी समझ कर, उसके प्राण-नाश पर भी उतारू हो जाता और अपनी भी जान दे देता है ।
“पञ्चतन्त्र”में भी लिखा है :—
• नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्त्वा नितम्बिनीम् ।
यस्याः संगेन जीव्येत द्वियेत च वियेगगतः ॥
स्त्रीके सिवा अमृत और विष दूसरी कोई चीज़ नहीं है ;
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