भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २५८ )

क्योंकि उसके सङ्गसे प्राणी जीता और उसके वियोगसे मरता है।

“भामिनी-विलास”में भी लिखा है :—

श्यामं सितं च सुदृशो न दृशोः स्वरूपं

किं तु स्फुटं गरलमेतदधामृतं च ॥

नो चेतकथं निपतनादनयोस्तदैव

मोहं मुदं च नितरां दधते युवानः ॥

सुलोचना स्त्रीकी आँखोंमें जो श्यामता और शुभ्रता—कलाई और सफेदी दीखती है, वह कलाई और सफेदी नहीं है ; किन्तु विष और अमृत है। यदि यह बात न होती, तो युवा पुरुष उसकी नज़र-से-नज़र मिलते ही मोहित और आनन्दित न होते।

स्त्रीकी आँखोंमें जो श्यामता या कलाई है, वह विष है और जो शुभ्रता या सफेदी है, वह अमृत है। जिसे वह खूब होकर अमृत की नज़रसे देखती है, उसे परम आनन्द होता है और जिसे वह नाराज़ होकर विषकी नज़रसे देखती है, उसे मोह या दुःख होता है। क्या खूब कहा है ! वाह ! पण्डितराज वाह !

दाहा ।

नहीं विष नहीं अमृत कहूँ, एक तिया तू जान ।

मिलवे में अमृत-नदी, विछुरे विषकी खान ॥७५॥