शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६८ )
रागो नविन्या हि निर्मर्गसिद्धः
स्त्वत्र अमत्येव मुथा पर्वत्रिः ॥७८॥
जिस तरह मूर्ख औरों कमलिनीकी स्वाभाविक ललाईको देखकर उसपर मुग्ध हो जाता और उसके चारों ओर गूंजता फिरता है ; उसी तरह मृदु पुरुष लीलावती स्त्रियोंके स्वाभाविक हाव-भाव और नाज़-नखरोंको देखकर उनपर मुग्ध हो जाते हैं ॥७८॥
खुलासा—कमलिनियोंमें जो एक प्रकारकी सुखी होती है, उसे औरों प्यारकी निशानी समझता है और इसीलिये उस पर आश्रित होकर उसके चारों ओर गूंजता हुआ घूमता करता है। कमलिनीकी तरह नवयौवना स्त्रियोंमें भी विलास—हाव-भाव और नाज़-नखरे स्वभावसे ही होते हैं ; पर अज्ञानी लोग उनके हाव-भावोंको देखकर मनमें समझते हैं कि, ये स्त्रियाँ हमें चाहती हैं ; पर असलमें वे चाहती-वाहती नहीं, हाव-भाव दिवाना तो उनका स्वभाव है। उनके हावभावोंको प्यारके चिह्न समझना महामूर्खता है। स्त्रियोंको पुरुषोंको तड़पते देखनेमें भी एक प्रकारका मजा सा आया करता है ; इसीलिये चञ्चल स्त्रियाँ जहाँ पुरुषोंको देखती हैं, वहाँ नाज़-नखरे किया करती हैं और जब उनका शिकार मछली की तरह तड़पता है, तब मनमें बड़ी खुश होती हैं।
दोहा ।
कामिनि बिलसत सहजमें, मूरख मानत प्यार ।
सहज सुगन्धित कुसुमिनि, औरा भ्रमत गँवार ॥७८॥