शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( २६८ )
रागो नविन्या हि निर्मर्गसिद्धः
स्त्वत्र अमत्येव मुथा पर्वत्रिः ॥७८॥
जिस तरह मूर्ख औरों कमलिनीकी स्वाभाविक ललाईको देखकर उसपर मुग्ध हो जाता और उसके चारों ओर गूंजता फिरता है ; उसी तरह मृदु पुरुष लीलावती स्त्रियोंके स्वाभाविक हाव-भाव और नाज़-नखरोंको देखकर उनपर मुग्ध हो जाते हैं ॥७८॥
खुलासा—कमलिनियोंमें जो एक प्रकारकी सुखी होती है, उसे औरों प्यारकी निशानी समझता है और इसीलिये उस पर आश्रित होकर उसके चारों ओर गूंजता हुआ घूमता करता है। कमलिनीकी तरह नवयौवना स्त्रियोंमें भी विलास—हाव-भाव और नाज़-नखरे स्वभावसे ही होते हैं ; पर अज्ञानी लोग उनके हाव-भावोंको देखकर मनमें समझते हैं कि, ये स्त्रियाँ हमें चाहती हैं ; पर असलमें वे चाहती-वाहती नहीं, हाव-भाव दिवाना तो उनका स्वभाव है। उनके हावभावोंको प्यारके चिह्न समझना महामूर्खता है। स्त्रियोंको पुरुषोंको तड़पते देखनेमें भी एक प्रकारका मजा सा आया करता है ; इसीलिये चञ्चल स्त्रियाँ जहाँ पुरुषोंको देखती हैं, वहाँ नाज़-नखरे किया करती हैं और जब उनका शिकार मछली की तरह तड़पता है, तब मनमें बड़ी खुश होती हैं।
दोहा ।
कामिनि बिलसत सहजमें, मूरख मानत प्यार ।
सहज सुगन्धित कुसुमिनि, औरा भ्रमत गँवार ॥७८॥
( १६६ )
सार—लोलावती चंचल स्त्रियों के हाव-भाव और नाज-नख़रों को मुहव्वतकी निशानी समझना नादानी है। यह तो उनका स्वभाव है।
78. The amorous plays of sportful women are quite natural to them but they arouse passion in the hearts of foolish men, just as a black bee hovers over a lotus being attracted by its redness which is natural to it.
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यदेतत्पूर्णेन्दुयुतिरसुदाराकृतिभं—
मुखाब्जं तन्वंगाः किल वसति यत्राधरमधु ।
इदं तावत्याकुटुम्बफलविवातीविरसं—
व्यतीतेऽस्मिन्काले विषमिव भविष्यत्यसुखदम् ॥७६॥
स्त्रीका पूर्णिमाके चन्द्रमाकी छविको हरनेवाला कमलसुख, जिसमें अधरामुत रहता है, मन्दारके फलकी तरह अज्ञात या यौवनावस्था तक ही अच्छा मालूम होता है ; समय बीतने यानी बुढ़ापा आने पर, वही कमल-सुख अनारके पके और सड़े फलकी तरह विष सा हो जाता है ॥७६॥
•खुलासा—जिस तरह अनारका फल अपने समयमें अमृत का मज़ा देता है, पर समय निकल जाने पर बर्ज़ायके और कड़वा हो जाता है ; उसी तरह स्त्रीका पूर्णोके चाँदको शामाने
( २७० )
वाला कमल सा मुह उठती जवानी या भर-जवानीमें ही अमृत सा रहता है । जवानी दीवानीके जाते ही, वह सड़े हुए अनारके फलकी तरह निकम्मा और विषसा हो जाता है ; क्योंकि बुढ़ापा आते ही दाँत गिर जाते हैं, गाल पिचक जाते हैं, चमड़ेमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और सुखों चली जाती हैं । बेकन महोदय कहते हैं—Beauty is as summer fruits which are easy to corrupt and can not last. सौन्दर्य्य श्रीष्म ऋतुके फलोंके समान है, जो जल्दी ही सड़ जाते और अधिक समय तक नहीं उहर सकते ।
दोहा ।
अथर मधुर मधु सहित सुख, हूतौ सबन शिरमौर ।
सो अब बिगरे फलन-सम, भयौ और सो और ॥७६॥
सार—स्त्रीको सारी शोभा जवानीमें ही ह । जवानी गई, फिर कुछ नहीं ।
79. The beautiful lotus-like face of a woman that surpasses the beauty of the full-moon having honeyed lips in it is very pleasant in young age only but when that time is past it becomes painful like poison just like the fruit of Mandara.
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उन्मीलत्रिवलीतरङ्गनिलया प्रोत्तुङ्गपीनस्तन-
दन्देनोयतचकवाकमिथुना वक्रान्धुजोद्गासिनी ॥
( २०१ )
कान्ताकारधरा नदीयमभितः कूराशयानेज्यते
संभाराएविमञ्जनंयदितोद्रेणसंलज्यताम् ॥८०॥
खुलासा—स्त्री एक नदी है। उसके पेट पर जो त्रिवर्लीके समान तीन रेखासी हैं, वही उस नदीकी लहर हैं, उसके दोनों कठोर कुच चकवेके जोड़े हैं और उसके जो कूर अभिप्राय हैं, वही भँवर हैं—जिस तरह और नदियाँ समुद्रमें जाकर गिरती हैं; उसी तरह स्त्री-नदी भी संसार-सागरमें जाकर गिरती है। जिस तरह और नदियोंमें गिरी हुई चीज़ नदीके प्रवाहके साथ चलती हुई समुद्रमें जा पड़ती है; उसी तरह स्त्री-नदीमें गिरी हुई वस्तु भी संसार-सागरमें जा पड़ती है। जो पुरुष इस स्त्री-नदीमें स्नान या क्रीड़ा प्रभृति करते हैं, वे उसके तेज बहावमें चलते-हुए संसार-सागरमें जा पड़ते हैं। समुद्रमें गिरे बाद बचना कठिन हो जाता है, इसलिये जो पुरुष संसार-सागरमें दूबनेसे बचना चाहें, वे स्त्री-नदीसे दूर रहें। इस भयङ्कर नदीके पास भी न जायँ। इस स्त्री-नदीका जोर साधारण नदियोंकी अपेक्षा बहुत अधिक है। और नदियोंमें तो वही डूबता है, जो उनके अन्दर घुसता या पैर देता है; पर स्त्री-नदी तो सामने आये हुए पुरुषको अपने बलसे, अजगरकी तरह, भीतर खींच लेती और फिर उसे संसार-सागरमें लेजा पटकती है। “भामिनी विलास”-कस्तु पण्डितवर जगन्नाथ महाराजने और ही तरह रूपक वाँचा है। उसका आशय कुछ और है, फिर भी उसका रसा-स्वादन कीजिये :-
( २७२ )
रूपजला चलनयना नाभ्यावर्तांकचावलि भुजंगा ।
मज्जनन्तियत्र सन्तः सेयं तहूषी तर्हगिष्यी विषमा ॥
रूप ही जल है, चंचल नयन मछलियाँ हैं, नामि भँवर है और सिरके बाल सर्प हैं—यह तरुण स्त्री रूपी नदी दुस्तर नदी है । इस नदीमें शृं गारशास्त्र-प्रवीण सज्जन ज्ञान करते हैं ।
महाकवि कालिदासके एक रूपकका भी रस आखादन कीजिये । उसमें कुछ और ही मज़ा है :—
वाहू द्वौ च मृणालमास्यकमलं, लावण्यलीलाजलं,
श्रोषी तीर्थशिला च नेत्रशफरी, धर्मिमल शैवालकम् ।
कान्तायाः स्तन चक्रवाक युगलं, कन्दर्पवाणानलैर्दग्ध-
नामवगाहनाय, विधिना रम्यं सरो निर्मितम् ॥
ब्रह्माने कामदेवके वाणोंकी अग्नि-ज्वालासे जलते हुए पुरुषों के ज्ञान करनेके लिये स्त्री रूपी सुन्दर तालाब बनाया है । इस तालाबमें क्या-क्या चीज़ें हैं ? इस तालाबमें स्त्रीकी दोनों भुजायें तो कमलकी डंडी हैं, उसका मुँह कमल है, उसके लावण्यका विलास जल है, कमर उतरनेकी सीढ़ी है, उसके नेत्र मछलियाँ हैं, उसके बँधे हुए केश—बाल सिवार हैं और दोनों स्तन चक्रवाकके जोड़े हैं ।
इसमें कोई शक नहीं, कि कन्दर्प-तापको स्त्रीके पयोधर—कुच ही शान्त करते हैं । शरीरमें कामवाणोंकी ज्वाला उठने पर, स्त्री ही उस ज्वाला को शान्त करती है ; पर बीमार होकर

( १७ ) कल्पलता बाहर की तिदरी में आकर खड़ी है ; उसके सिर के बाल बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है ।
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( २७३ )
दवा खाने और आरोग्य होनेकी अपेक्षा बीमार न होना कहीं अच्छा है ।
क्षपय ।
लिवली तरल तरंग, लसत कुच चक्रवाक-सम ।
प्रकुलित आनन कञ्च, नारि यह नदी मनोरम ।
महा भयानक चाल, चलत भवसागर-सन्मुख ।
हाथ धरत ही ऐंच लेत, जितको अपने रख ।
संसार-सिन्धु चाहत तर्बो, तौ तू यासौ दूर रह ।
जाको प्रवाह अतिही प्रवल, नैक न्हात ही जात वह ॥८०॥
सार—स्त्री-रूपी दुस्तर नदी से सदा दूर रहो, क्योंकि इसके सामने जानेवाले की भी खैर नहीं ।
80. A woman who is compared to a river, having the beautiful linings on the stomach like waves (of the river), having developed breasts like the pair of Chakrabak and the face shining like the lotus, but whose intention is very crooked should be shunned carefully if one does not wish to be drowned in it. (A river may appear very pleasing in sight but anything falling in it is taken to the deep ocean, so also the woman may appear attractive but any one indulging in her is ruined.)
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१८
( २७४ )
जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविश्रमाः ।
हृदये चिन्तयन्त्यन्यं भियः को नाम योषिताम् ॥१२॥
स्त्रियाँ बात तो किसीसे करती हैं, देखतीं किसी औरको हैं, और दिलमें चाहतीं किसी और को हैं । विलासवती स्त्रियोंका प्यारा कौन है ? ॥१२॥
खुलासा—वास्तवमें, स्त्रियोंका प्यारा कोई भी नहीं । जो एक ही समयमें बात एकसे करती हैं, देखतीं दूसरेको और दिलमें चाहतीं तीसरेको हैं, उनका प्रेम किससे हो सकता है ?
स्त्री स्वभावसे ही चञ्चल है । इसका चित्त एक जगह स्थिर नहीं रहता । इसके मनमें कुछ, बातोंमें कुछ और आँखोंमें कुछ । इसके चित्तका पता नहीं । यह सदा किसी एकसे मुहव्यत नहीं रखती । बेईमानी, धोखेबाज़ी, छल, कपट, भूट और बेवफ़ाई तो परमात्माने इसे खूब ही दी है । महाकवि दगने खूब कहा है—
तुमसे बचकर इक वफ़ा, हिस्सेमें अपनी लग गई ।
तुमने खूबी कौनसी, छोड़ी ज़मानेके लिये ॥
सब है, सभी अच्छी चीज़ें तुम्हारे हिस्सेमें आ गईं । एक वफ़ा ज़रूर तुमसे बचकर मेरे हिस्सेमें आ गई है । इस खूबीको छोड़ कर और सब खूबियाँ तुम्हारे पास मौजूद हैं ।
स्त्री बाहरसे जैसी मनोहर दीखती है, भीतरसे वैसी नहीं होती । उसका शरीर मनोहर होता है, पर हृदय वज्रवत् कठोर
( २७५ )
होता है। वह अपने चन्द्रमुखसे मधु-जैसी मीठी-मीठी बातें करती है और तीक्ष्ण वित्तसे चोट मारती है। इसीलिये कहते हैं कि, उसकी जीभमें मधु और हृदयमें हालाहल विष रहता है। पर जिन्होंने संसार नहीं देखा है, जिन्हें इस जगत्की टेढ़ी-सीधी बातें नहीं मालूम, वे नातजुर्वंकार नौजवान, इन बातोंको न समझ कर, इन कुटिला कामिनियोंका पूर्ण विश्वास कर बैठते हैं। इनके यह कहने पर, कि आप ही हमारे सूरज, आप ही हमारे चाँद और आप ही हमारे परमेश्वर हो, आप ही से हमें जगत्में उजियाला है; नवयुवक पागलसे हो जाते हैं और इन्हें सती सीता और सावित्री समझ कर इनके कीतदास हो जाते हैं। जब कामी पुरुष सोलह आने इनके क्राबूमें हो जाते हैं, तब वे निरंकुश होकर अपनी माया रचने लगती हैं। एकको आँखोंके इशारोंसे, दूसरेको बातोंसे, तीसरेको चेष्टाओंसे प्रसन्न करतीं और चौथे—अपने पति—को अपनी मायामें पागल बनाये रखती हैं। उसे सूक्ष्मता होने पर भी अन्या कर देती हैं। उसके मौजूद रहते कुकर्म करती हैं; पर उस भौँदूको कुछ नहीं सूक्ष्मता। बुद्धिमानोंको इनके सतीत्व पर हरगिज़ विश्वास न करना चाहिये; क्योंकि किसी एक की होना तो विधाता इनके भालमें लिखा ही नहीं। किसीने ठीक ही कहा है:—
यदि स्यात्पावकः शीतः, प्रोप्नो वा शशलाश्वनः क्षीणां तदा सतीत्वं स्याद्, यदि स्याद् दुर्जनोहितः ॥
( २७६ )
अगर आग शीतल हो जाय, चन्द्रमा गरम हो जाय और डुर्जन हितकारी हो जायें, तभी खियोंके सतीत्वका विश्वास किया जा सकता है।
और भी कहा है—
यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं कामिनी ।
स तस्या वशगो नित्यं भवेत् कीडाशकुन्तवत् ॥
जो मूढ़ मनुष्य यह समझता है कि, यह स्त्री मुझे प्यार करती है, वह उसके वश होकर खेलके पक्षीकी तरह हो जाता है। पर वास्तवमें, वह उसे नहीं चाहती। उसको न कोई प्यारा है और न कुप्यारा। जिस पर तबियत आजाय, वह उसी की है; पर उसकी भी सदा-सर्वदा नहीं। चञ्चल नारी-जातिका चित्त कभी भी स्थिर हो सकता है ?
दोहा ।
मनमें कछु बातन कछु, नैननमें कछु और ।
चित्तकी गति कछु और ही, यह प्यारी किहि ठौर ॥८१॥
सार—स्त्री बेवफा है। उसकी मुहब्बत सर्वदा किसीके साथ रह ही नहीं सकती। जिसकी स्त्री वफादार और सती हो, वह निस्सन्देह पूर्ण पुण्यत्मा है।

( २० ) उसने अपने सामने रखा हुआ गँडासा मेरी पीठ पर मारा ।
( २७८ )
सत्संगः केशवे भक्तिगीताम्भसि नियमज्जनम् ।
असारे खलु संसारे कीर्ति साराणि भावयेत् ॥
सत्पुरुषोंका संग, कृष्ण की भक्ति और गङ्गाजलका स्नान— इस असार संसारमें ये तीन ही सार समझे जाते हैं ।
एक घरी आधी घरी, आधी सोभी आध ।
कबिरा संगति साधुकी, कटै कोटि अपराध ॥
कबिरा संगति साधुकी, नितप्रति कीजै जाय ।
दुर्मति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय ॥
एक घड़ी, आधी घड़ी और पाव घड़ी-जितना भी समय मिले, सत्पुरुषों की संगति अवश्य करनी चाहिये, क्योंकि उनकी संगतिसे करोड़ों अपराध नष्ट हो जाते हैं ।
साधु पुरुषों की संगति नित्य ही करनी चाहिये, क्योंकि उससे कुमति दूर होती और सुमति आती है ।
इस संसार रूपी कड़वे वृक्षके दो ही फल हैं :—( १ ) मीठा बोलना, और ( २ ) सज्जनों का संग । लेखनीमें सामर्थ्य नहीं, जो सत्संग की महिमा बखान सके । यद्यपि लोहा पानीमें जाकर साफ नहीं होता, उस पर उल्टी जंग बढ़ जाती है ; तोभी पारसके साथ मिलनेसे वह सोना हो जाता है । उसी तरह सत्संगसे नीच भी महापुरुष हो जाता है । सप्त ऋषियों की संगतिसे नित्य प्रति हत्या करने वाला व्याधा महामुनियों की
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गणनामें आगया । बहुत क्या—सत्संग की महिमा मेरे दिल पर अच्छी तरह जमी हुई थी, इस लिए मुझे बाल्यावस्थासे ही साधु-महात्माओं की सांगति ज़ियादा पसन्द थी । मेरे गाँवमें कोई भी महात्मा आता, तो मैं उसके आनेका समाचार पाते ही उसके पास ज़रूर पहुँचता ।
एक बार हमारे गाँवके श्मशानमें एक संन्यासी आकर ठहरे । वह जातिके ब्राह्मण, पूर्ण विद्वान्, सच्चे त्यागी और वास्तविक महात्मा थे । उनकी उम्र भी ज़ियादा न थी, कोई वालीस बरसके होंगे । उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट और गठौला था । उनके चेहरेसे एक प्रकारका अपूर्व तेज टपका पड़ता था । उनको देखते ही हर मनुष्यके दिलमें उनके प्रति श्रद्धा और भक्तिका भाव उदय होता था । उनकी शोहरत सारे गाँवमें फैल गई—इसलिए सैकड़ों स्त्री-पुरुष उनके दर्शनोके लिए श्मशानमें जाते और उनके दर्शन करके नेत्र सफ़ल करते थे । अधिक क्या कहूँ, मेला सा लगा रहता था । मैं भी नित्य-बिला नागा उनके दर्शनोको जाया करता था । वह हर समय वेदान्त-चर्चा किया करते थे । उनकी तर्कशक्ति, विद्वत्ता और प्रबल युक्तियोंको देखकर लोग दंग रह जाते थे । हरेकके मुँहसे वाह-वाह निकलती थी । पर एक बात उनमें विशेष रूपसे देखनेमें आती थी । वह यह कि, उन्हें स्त्रियोंका—हासकर जवान स्त्रियोंका वहाँ आना पसन्द नहीं था । उनके दंग-डौलसे ऐसा प्रतीत होता था, मानो उन्हें युवतियोंके दर्शन से
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घृणा है। वे हमलोगोंको संसारकी असारता और देहकी क्षणभङ्गुरता इस तरह समझाते थे कि, हम सभी श्रोताओंके दिलों पर उनकी बातोंका असर फौरन ही हो जाता था। हमारे दिलोंमें सच्चे वैराग्यका उदय हो आता था। उनके मुँहसे निकली हुई स्त्रियोंकी निन्दा सुनकर तो स्त्रियोंका नाम सुननेसे भी घृणा सी हो जाती थी। वे अपनी बात-चीतके दौरानमें संस्कृतके श्लोक बहुतायतसे कहा करते थे। नीचे लिखा हुआ श्लोक तो वे एक-दो बार नित्य ही कहा करते और शेषमें दर्दभरी आह सी खींचा करते थे। वह श्लोक यह था :--
सुचिन्तितमपि शास्त्रं परिचिन्तनीयम् आराधितोऽपि नृपतिः परिशंकनीयः । क्रोडेस्थितापि युवतीः परिरङ्गायिः शास्त्रे नृपे च युवतौ च कुतो वशीत्वम् ॥
शास्त्रको अच्छी तरह पढ़ लेने पर भी उसका पाठ हमेशा करते रहना चाहिये। राजाको अपने ऊपर मिह्रवान देखकर भी उससे डरते रहना चाहिये। गौदमें बैठो हुई भो जवान स्त्रीकी रक्षा बड़ी होशियारीसे करनी चाहिये। क्योंकि शास्त्र, राजा और जवान स्त्री ये किसीके भी वशीभूत होकर नहीं रहते।
उनके मुखसे यह श्लोक बारम्बार सुननेसे मुझे कुछ शङ्का सी हुआ करती थी। मैं पूछना चाहता था कि महाराजा ! आप युवतियोंकी इतनी निन्दा क्यों किया करते हैं ; पर उनके तेज-
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प्रताप या रौवसे पुल्लेकी हिम्मत न कर सका । एकवार हिम्मत वाँधकर मैं कह ही तो उठा—“भगवान् ! स्त्रियाँ न हों, तो ईश्वरकी सृष्टि ही लोप हो जाय, यह संसार सूना हो जाय; यहाँ कुछ भी दिखाई ही न दे । पुरुष और प्रकृतिसे ही यह सृष्टि है । अकेला पुरुष सृष्टि-रचना नहीं कर सकता । जगत्की रचनामें प्रकृति की सहायता की परमावश्यकता है । भगवान् रामचन्द्र, भगवान् श्रीकृष्ण, महाराजा हरिश्चन्द्र, महाराज भरत और प्रह्लाद प्रभृति खीसे ही पैदा हुए हैं । किसीने कहा है—
नारी-निन्दा मत करो, नारी नरकी खान ।
नारीसे नर ऊपजे, धू-पह्लाद-समान ॥
नारी-जातिकी निन्दा मत करो, क्योंकि नारी ही नरोंकी खान है । नारीसे ही ध्रुव और प्रह्लाद जैसे महापुरुषोंने जन्म लिया है ।
मेरी बात सुनकर वे कहने लगे—“भैया ! तुम्हारी बात सच है । निस्सन्देह, स्त्री-विना ईश्वरकी सृष्टि नहीं चल सकती । खी से ही जगत्की उत्पत्ति है । इस विषयमें मेरा मत-भेद नहीं । मेरा तो कहना है कि, स्त्रियोंकी प्रीति निश्चल नहीं होती । उनका दिल बड़ा चञ्चल होता है । क्षण-भरमें वे पराई हो जाती हैं । जिस तरह गाय नयी-नयी घास चरना चाहती है ; उसी तरह स्त्रियाँ नित-नये पुरुषोंको भोगना चाहती हैं । बलवान् पुरुषोंसे भी उनकी कामाग्नि शान्त नहीं होती । अब मैं तुम्हें
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चन्द ऐसी कहानियाँ सुनाता हूँ, जिनसे तुम्हें मेरी बातोंकी सत्यतामें अणुमात्र भी सन्देह न रहेगा। ध्यान देकर सुन—
“किसी शहड़में एक विद्वान, रूपवान और रतिशास्त्रपारङ्गत ब्राह्मण रहता था। वह अपनी स्त्रीको प्राणसे भी अधिक प्यार करता था; लेकिन उसकी स्त्री कलहकारिणी थी। वह अपनी सास-ननद और दिव्रानी-जिठानियोंसे रोज़ तकरार किया करती थी; इसलिये वह ब्राह्मण नित्यके क्लेशसे दुःखी होकर, अपनी प्यारी स्त्रीको लेकर, किसी दूसरे नगरको चल दिया। चलते-चलते वे दोनों एक घोर बनमें पहुँचे। ब्राह्मण की स्त्रीको बड़े जोरसे प्यास लगी। उसने अपने पतिसे कहा—‘मुझे प्यास बहुत जोरसे लगी है, आप कहीं से जल लावे’ तो मेरी जान बचे।’ ब्राह्मण लोटा डोर लेकर पानीकी खोजमें गया। बड़ी खोजसे उसे एक कुआ मिल। वह पानी भर कर वापस लौटा। लेकिन आकर क्या देखता है कि, उसकी प्राणप्यारी मरी हुई पड़ी है और पास ही एक काल भुजङ्ग बैठा है। ब्राह्मणको देखते ही साँप जड़ल्लमें भाग गया। ब्राह्मणने समझ लिया कि, मेरी स्त्री को सर्पने डसा है।
उसने बहुत देर तक तो विलाप किया; फिर जड़ल्लसे लकड़ी लाकर चिता बनाई और उस चितामें स्त्री सहित जल्लनेकी तैयारी की। इतनेमें आकाशवाणी हुई—‘हे विप्र! अगर तू अपनी आयु मेंसे आधी आयु इसे दे दे, तो यह जी सकती है।’ यह वाणी सुनते ही ब्राह्मणने स्नान-ध्यानसे पवित्र हो, तीन बार
( २८३ )
संकल्पका मंत्र कहकर, अपनी स्त्रीको आधी उग्र दे दी। ब्राह्मणी तत्काल जी उठी। ब्राह्मणने उससे यह बात न कही। जड़ूलसे फल-मूल लाकर उसे खिलाये और आप खाये। फिर वहाँसे दोनों चल दिये।
चन्दु रोज बाद वे दोनों स्त्री-पुरुष एक बड़े नगरमें पहुँचे। नगरके बाहर एक मनोहर बाग था। ब्राह्मण वहाँ ठहर गया। स्नान-पूजासे निपटकर उसने ब्राह्मणीसे कहा—'मैं शहरमें जाकर खाने-पीनेका सामान ले आता हूँ, तुम यहीं बैठ रही हो, आकर भोजन बनाऊँगा और फिर दोनों खायेंगे।' यह कहकर ब्राह्मण तो शहरमें चला गया और ब्राह्मणी अकेली बैठ रही। उस बागके कूप की सीढ़ियों पर एक लँगड़ा आदमी बैठा हुआ मनोहर खरसे गीत गा रहा था। उसके गानेसे स्त्रीका काम जाग उठा। वह काम-पीड़ित हो, लँगड़ेके पास जाकर बोली—'हे भद्र पुरुष! तू मेरे साथ भोग कर। अगर तू मेरी कामशान्ति न करेगा, तो तुम्हें मुझ अबलाकी हत्या लगेगी। स्त्री-हत्या बहुत बड़ा पाप है।' लँगड़ा बोला! 'हे कल्याण! मैं रोगी हूँ, अद्भुत हूँ, मुझसे तेरी शान्ति न होगी।' स्त्री बोली—'मैं तेरी एक बात नहीं सुनूँगी। अगर तू मेरा कहना न मानेगा, तो मैं अभी हत्या करके तुम्हें राजाके सिपाहियोंसे पकड़वा दूँगी।' अखिरकार वह लँगड़ा भयसे या और किसी वजहसे उसकी बात पर राजी हो गया। उसने उससे संगम किया। संगम हो चुकने पर वह बोली—'हे भद्र! तुम बड़े अच्छे पुरुष
( २८४ )
हो। मेरी आत्मा तुमसे सन्तुष्ट है। अबसे मैं तुम्हारी हो चुकी। मैंने तुम्हें आत्मसमर्पण किया। अब तुम भी हमारे साथ चले चलो।' लँगड़े ने कहा—'मैं न तो चल सकता हूँ और न कमा सकता हूँ, इसलिये मुझे ले चलनेसे तुम्हें कष्ट होगा।' स्त्री ने कहा—'तुम चुप रहो, मैं सब इन्तज़ाम कर लूँगी।'
इन दोनोंमें ये बातें हो ही रही थीं कि, ब्राह्मण शहरसे आटा, दाल, घी और लकड़ी लेकर आ गया। भोजन बनाकर खानेकी तैयारी करने लगा, तब ब्राह्मणी बोली—'हे खामिन! यह लँगड़ा भी भूखा है। इसे बिना खिलाये खाना उचित नहीं। इसलिये इसे भी परोस दीजिये।' भोले ब्राह्मणने आप खाया, स्त्री और उस लँगड़ेको भी खिलाया। खा-पीकर जब वे आगे चलने लगे, तब स्त्री बोली—'हे पतिदेव! आप और मैं दो ही जने हैं, आप कहीं चले जाओगे तो अकेलेमें मेरा मन न लगेगा। इसलिये इस लँगड़ेको आप कन्धे पर रखकर ले चले', तो मुझे बातचीत का सहारा हो जायगा।' ब्राह्मण बोला—'प्यारी! मुझे अपना शरीर ही भारी हो रहा है, मैं इसे न ले चल सकूँगा।' तब स्त्रीने स्वयं उसे गाँठमें बाँधकर अपने सिर पर धर लिया। ब्राह्मण ने उसकी बातोंमें आकर ई कार नहीं किया। कुछ दिनों बाद वे एक और गाँवके निकट पहुँचे। ब्राह्मण कूप से पानी भरने लगा। उसकी स्त्रीने उसे कूपमें धकेल दिया और अपनी गठड़ी को लेकर आगे चल दी। पुलिसने चोरीका माल समझ कर
( २८५ )
उसकी गठड़ी खुलवाई, तो उसमें लैंगड़ा निकला। सिपाही उसे हाकिमके पास ले गये। हाकिम ने पूछा—'यह क्या मामिला है ?' तू ने मर्दको गठरीमें क्यों बाँध रखा है ?'
ब्राह्मणीने जवाब दिया—'यह मेरा पति है। यह चल नहीं सकता, इसलिये मैं इसे गठरीमें धरकर घूमती हूँ। महाराज ! पतिव्रताका यही धर्म है।' हाकिम उसकी बातसे खुश होकर उसे राजाके पास ले गया। राजा उसका पतिन्हे देखकर बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसे आनन्दसे जीवन बितानेके लिए दो गाँव इनाममें दिये।
कुछ रोज बाद वह ब्राह्मण भी किसी तरह क्रूर से निकलकर उसी नगरमें आया। उस स्त्रीने उसे देखते ही राजासे प्रार्थना की, कि महाराज ! यह आदमी मेरे पतिका शत्रु है। राजाने सुनते ही, बिना विचार किये, ब्राह्मणको शूली पर चढ़ाने की आज्ञा दे दी। तब ब्राह्मणने राजासे कहा—' आप धर्मात्मा राजा है, आपने मुझे दण्ड दिया, सो तो मैं भोगूंगा ही, पर इसके पास मेरी कुछ संकान्त वस्तु है, वह मुझें दिला दीजिये। इसके बाद मुझें फाँसी पर चढ़वाइये।' राजाने कहा—'हे पतिव्रते ! तूने इसकी कुछ संकान्त वस्तु ली है ?' ब्राह्मणीने कहा—'मैंने तो इससे कुछ भी नहीं लिया है।' ब्राह्मण बोला—'तू हाथमें पानी लेकर तीन बार यह कह दे, कि इसने मुझे जो कुछ भी दिया हो, वह मैं वापस देती हूँ।' स्त्री राजाके भयसे इस बात पर राजी हो गई और तीन बार