शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७८ )
सत्संगः केशवे भक्तिगीताम्भसि नियमज्जनम् ।
असारे खलु संसारे कीर्ति साराणि भावयेत् ॥
सत्पुरुषोंका संग, कृष्ण की भक्ति और गङ्गाजलका स्नान— इस असार संसारमें ये तीन ही सार समझे जाते हैं ।
एक घरी आधी घरी, आधी सोभी आध ।
कबिरा संगति साधुकी, कटै कोटि अपराध ॥
कबिरा संगति साधुकी, नितप्रति कीजै जाय ।
दुर्मति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय ॥
एक घड़ी, आधी घड़ी और पाव घड़ी-जितना भी समय मिले, सत्पुरुषों की संगति अवश्य करनी चाहिये, क्योंकि उनकी संगतिसे करोड़ों अपराध नष्ट हो जाते हैं ।
साधु पुरुषों की संगति नित्य ही करनी चाहिये, क्योंकि उससे कुमति दूर होती और सुमति आती है ।
इस संसार रूपी कड़वे वृक्षके दो ही फल हैं :—( १ ) मीठा बोलना, और ( २ ) सज्जनों का संग । लेखनीमें सामर्थ्य नहीं, जो सत्संग की महिमा बखान सके । यद्यपि लोहा पानीमें जाकर साफ नहीं होता, उस पर उल्टी जंग बढ़ जाती है ; तोभी पारसके साथ मिलनेसे वह सोना हो जाता है । उसी तरह सत्संगसे नीच भी महापुरुष हो जाता है । सप्त ऋषियों की संगतिसे नित्य प्रति हत्या करने वाला व्याधा महामुनियों की