शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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सत्संगः केशवे भक्तिगीताम्भसि नियमज्जनम् ।
असारे खलु संसारे कीर्ति साराणि भावयेत् ॥
सत्पुरुषोंका संग, कृष्ण की भक्ति और गङ्गाजलका स्नान— इस असार संसारमें ये तीन ही सार समझे जाते हैं ।
एक घरी आधी घरी, आधी सोभी आध ।
कबिरा संगति साधुकी, कटै कोटि अपराध ॥
कबिरा संगति साधुकी, नितप्रति कीजै जाय ।
दुर्मति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय ॥
एक घड़ी, आधी घड़ी और पाव घड़ी-जितना भी समय मिले, सत्पुरुषों की संगति अवश्य करनी चाहिये, क्योंकि उनकी संगतिसे करोड़ों अपराध नष्ट हो जाते हैं ।
साधु पुरुषों की संगति नित्य ही करनी चाहिये, क्योंकि उससे कुमति दूर होती और सुमति आती है ।
इस संसार रूपी कड़वे वृक्षके दो ही फल हैं :—( १ ) मीठा बोलना, और ( २ ) सज्जनों का संग । लेखनीमें सामर्थ्य नहीं, जो सत्संग की महिमा बखान सके । यद्यपि लोहा पानीमें जाकर साफ नहीं होता, उस पर उल्टी जंग बढ़ जाती है ; तोभी पारसके साथ मिलनेसे वह सोना हो जाता है । उसी तरह सत्संगसे नीच भी महापुरुष हो जाता है । सप्त ऋषियों की संगतिसे नित्य प्रति हत्या करने वाला व्याधा महामुनियों की
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गणनामें आगया । बहुत क्या—सत्संग की महिमा मेरे दिल पर अच्छी तरह जमी हुई थी, इस लिए मुझे बाल्यावस्थासे ही साधु-महात्माओं की सांगति ज़ियादा पसन्द थी । मेरे गाँवमें कोई भी महात्मा आता, तो मैं उसके आनेका समाचार पाते ही उसके पास ज़रूर पहुँचता ।
एक बार हमारे गाँवके श्मशानमें एक संन्यासी आकर ठहरे । वह जातिके ब्राह्मण, पूर्ण विद्वान्, सच्चे त्यागी और वास्तविक महात्मा थे । उनकी उम्र भी ज़ियादा न थी, कोई वालीस बरसके होंगे । उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट और गठौला था । उनके चेहरेसे एक प्रकारका अपूर्व तेज टपका पड़ता था । उनको देखते ही हर मनुष्यके दिलमें उनके प्रति श्रद्धा और भक्तिका भाव उदय होता था । उनकी शोहरत सारे गाँवमें फैल गई—इसलिए सैकड़ों स्त्री-पुरुष उनके दर्शनोके लिए श्मशानमें जाते और उनके दर्शन करके नेत्र सफ़ल करते थे । अधिक क्या कहूँ, मेला सा लगा रहता था । मैं भी नित्य-बिला नागा उनके दर्शनोको जाया करता था । वह हर समय वेदान्त-चर्चा किया करते थे । उनकी तर्कशक्ति, विद्वत्ता और प्रबल युक्तियोंको देखकर लोग दंग रह जाते थे । हरेकके मुँहसे वाह-वाह निकलती थी । पर एक बात उनमें विशेष रूपसे देखनेमें आती थी । वह यह कि, उन्हें स्त्रियोंका—हासकर जवान स्त्रियोंका वहाँ आना पसन्द नहीं था । उनके दंग-डौलसे ऐसा प्रतीत होता था, मानो उन्हें युवतियोंके दर्शन से
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घृणा है। वे हमलोगोंको संसारकी असारता और देहकी क्षणभङ्गुरता इस तरह समझाते थे कि, हम सभी श्रोताओंके दिलों पर उनकी बातोंका असर फौरन ही हो जाता था। हमारे दिलोंमें सच्चे वैराग्यका उदय हो आता था। उनके मुँहसे निकली हुई स्त्रियोंकी निन्दा सुनकर तो स्त्रियोंका नाम सुननेसे भी घृणा सी हो जाती थी। वे अपनी बात-चीतके दौरानमें संस्कृतके श्लोक बहुतायतसे कहा करते थे। नीचे लिखा हुआ श्लोक तो वे एक-दो बार नित्य ही कहा करते और शेषमें दर्दभरी आह सी खींचा करते थे। वह श्लोक यह था :--
सुचिन्तितमपि शास्त्रं परिचिन्तनीयम् आराधितोऽपि नृपतिः परिशंकनीयः । क्रोडेस्थितापि युवतीः परिरङ्गायिः शास्त्रे नृपे च युवतौ च कुतो वशीत्वम् ॥
शास्त्रको अच्छी तरह पढ़ लेने पर भी उसका पाठ हमेशा करते रहना चाहिये। राजाको अपने ऊपर मिह्रवान देखकर भी उससे डरते रहना चाहिये। गौदमें बैठो हुई भो जवान स्त्रीकी रक्षा बड़ी होशियारीसे करनी चाहिये। क्योंकि शास्त्र, राजा और जवान स्त्री ये किसीके भी वशीभूत होकर नहीं रहते।
उनके मुखसे यह श्लोक बारम्बार सुननेसे मुझे कुछ शङ्का सी हुआ करती थी। मैं पूछना चाहता था कि महाराजा ! आप युवतियोंकी इतनी निन्दा क्यों किया करते हैं ; पर उनके तेज-
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प्रताप या रौवसे पुल्लेकी हिम्मत न कर सका । एकवार हिम्मत वाँधकर मैं कह ही तो उठा—“भगवान् ! स्त्रियाँ न हों, तो ईश्वरकी सृष्टि ही लोप हो जाय, यह संसार सूना हो जाय; यहाँ कुछ भी दिखाई ही न दे । पुरुष और प्रकृतिसे ही यह सृष्टि है । अकेला पुरुष सृष्टि-रचना नहीं कर सकता । जगत्की रचनामें प्रकृति की सहायता की परमावश्यकता है । भगवान् रामचन्द्र, भगवान् श्रीकृष्ण, महाराजा हरिश्चन्द्र, महाराज भरत और प्रह्लाद प्रभृति खीसे ही पैदा हुए हैं । किसीने कहा है—
नारी-निन्दा मत करो, नारी नरकी खान ।
नारीसे नर ऊपजे, धू-पह्लाद-समान ॥
नारी-जातिकी निन्दा मत करो, क्योंकि नारी ही नरोंकी खान है । नारीसे ही ध्रुव और प्रह्लाद जैसे महापुरुषोंने जन्म लिया है ।
मेरी बात सुनकर वे कहने लगे—“भैया ! तुम्हारी बात सच है । निस्सन्देह, स्त्री-विना ईश्वरकी सृष्टि नहीं चल सकती । खी से ही जगत्की उत्पत्ति है । इस विषयमें मेरा मत-भेद नहीं । मेरा तो कहना है कि, स्त्रियोंकी प्रीति निश्चल नहीं होती । उनका दिल बड़ा चञ्चल होता है । क्षण-भरमें वे पराई हो जाती हैं । जिस तरह गाय नयी-नयी घास चरना चाहती है ; उसी तरह स्त्रियाँ नित-नये पुरुषोंको भोगना चाहती हैं । बलवान् पुरुषोंसे भी उनकी कामाग्नि शान्त नहीं होती । अब मैं तुम्हें
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चन्द ऐसी कहानियाँ सुनाता हूँ, जिनसे तुम्हें मेरी बातोंकी सत्यतामें अणुमात्र भी सन्देह न रहेगा। ध्यान देकर सुन—
“किसी शहड़में एक विद्वान, रूपवान और रतिशास्त्रपारङ्गत ब्राह्मण रहता था। वह अपनी स्त्रीको प्राणसे भी अधिक प्यार करता था; लेकिन उसकी स्त्री कलहकारिणी थी। वह अपनी सास-ननद और दिव्रानी-जिठानियोंसे रोज़ तकरार किया करती थी; इसलिये वह ब्राह्मण नित्यके क्लेशसे दुःखी होकर, अपनी प्यारी स्त्रीको लेकर, किसी दूसरे नगरको चल दिया। चलते-चलते वे दोनों एक घोर बनमें पहुँचे। ब्राह्मण की स्त्रीको बड़े जोरसे प्यास लगी। उसने अपने पतिसे कहा—‘मुझे प्यास बहुत जोरसे लगी है, आप कहीं से जल लावे’ तो मेरी जान बचे।’ ब्राह्मण लोटा डोर लेकर पानीकी खोजमें गया। बड़ी खोजसे उसे एक कुआ मिल। वह पानी भर कर वापस लौटा। लेकिन आकर क्या देखता है कि, उसकी प्राणप्यारी मरी हुई पड़ी है और पास ही एक काल भुजङ्ग बैठा है। ब्राह्मणको देखते ही साँप जड़ल्लमें भाग गया। ब्राह्मणने समझ लिया कि, मेरी स्त्री को सर्पने डसा है।
उसने बहुत देर तक तो विलाप किया; फिर जड़ल्लसे लकड़ी लाकर चिता बनाई और उस चितामें स्त्री सहित जल्लनेकी तैयारी की। इतनेमें आकाशवाणी हुई—‘हे विप्र! अगर तू अपनी आयु मेंसे आधी आयु इसे दे दे, तो यह जी सकती है।’ यह वाणी सुनते ही ब्राह्मणने स्नान-ध्यानसे पवित्र हो, तीन बार
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संकल्पका मंत्र कहकर, अपनी स्त्रीको आधी उग्र दे दी। ब्राह्मणी तत्काल जी उठी। ब्राह्मणने उससे यह बात न कही। जड़ूलसे फल-मूल लाकर उसे खिलाये और आप खाये। फिर वहाँसे दोनों चल दिये।
चन्दु रोज बाद वे दोनों स्त्री-पुरुष एक बड़े नगरमें पहुँचे। नगरके बाहर एक मनोहर बाग था। ब्राह्मण वहाँ ठहर गया। स्नान-पूजासे निपटकर उसने ब्राह्मणीसे कहा—'मैं शहरमें जाकर खाने-पीनेका सामान ले आता हूँ, तुम यहीं बैठ रही हो, आकर भोजन बनाऊँगा और फिर दोनों खायेंगे।' यह कहकर ब्राह्मण तो शहरमें चला गया और ब्राह्मणी अकेली बैठ रही। उस बागके कूप की सीढ़ियों पर एक लँगड़ा आदमी बैठा हुआ मनोहर खरसे गीत गा रहा था। उसके गानेसे स्त्रीका काम जाग उठा। वह काम-पीड़ित हो, लँगड़ेके पास जाकर बोली—'हे भद्र पुरुष! तू मेरे साथ भोग कर। अगर तू मेरी कामशान्ति न करेगा, तो तुम्हें मुझ अबलाकी हत्या लगेगी। स्त्री-हत्या बहुत बड़ा पाप है।' लँगड़ा बोला! 'हे कल्याण! मैं रोगी हूँ, अद्भुत हूँ, मुझसे तेरी शान्ति न होगी।' स्त्री बोली—'मैं तेरी एक बात नहीं सुनूँगी। अगर तू मेरा कहना न मानेगा, तो मैं अभी हत्या करके तुम्हें राजाके सिपाहियोंसे पकड़वा दूँगी।' अखिरकार वह लँगड़ा भयसे या और किसी वजहसे उसकी बात पर राजी हो गया। उसने उससे संगम किया। संगम हो चुकने पर वह बोली—'हे भद्र! तुम बड़े अच्छे पुरुष
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हो। मेरी आत्मा तुमसे सन्तुष्ट है। अबसे मैं तुम्हारी हो चुकी। मैंने तुम्हें आत्मसमर्पण किया। अब तुम भी हमारे साथ चले चलो।' लँगड़े ने कहा—'मैं न तो चल सकता हूँ और न कमा सकता हूँ, इसलिये मुझे ले चलनेसे तुम्हें कष्ट होगा।' स्त्री ने कहा—'तुम चुप रहो, मैं सब इन्तज़ाम कर लूँगी।'
इन दोनोंमें ये बातें हो ही रही थीं कि, ब्राह्मण शहरसे आटा, दाल, घी और लकड़ी लेकर आ गया। भोजन बनाकर खानेकी तैयारी करने लगा, तब ब्राह्मणी बोली—'हे खामिन! यह लँगड़ा भी भूखा है। इसे बिना खिलाये खाना उचित नहीं। इसलिये इसे भी परोस दीजिये।' भोले ब्राह्मणने आप खाया, स्त्री और उस लँगड़ेको भी खिलाया। खा-पीकर जब वे आगे चलने लगे, तब स्त्री बोली—'हे पतिदेव! आप और मैं दो ही जने हैं, आप कहीं चले जाओगे तो अकेलेमें मेरा मन न लगेगा। इसलिये इस लँगड़ेको आप कन्धे पर रखकर ले चले', तो मुझे बातचीत का सहारा हो जायगा।' ब्राह्मण बोला—'प्यारी! मुझे अपना शरीर ही भारी हो रहा है, मैं इसे न ले चल सकूँगा।' तब स्त्रीने स्वयं उसे गाँठमें बाँधकर अपने सिर पर धर लिया। ब्राह्मण ने उसकी बातोंमें आकर ई कार नहीं किया। कुछ दिनों बाद वे एक और गाँवके निकट पहुँचे। ब्राह्मण कूप से पानी भरने लगा। उसकी स्त्रीने उसे कूपमें धकेल दिया और अपनी गठड़ी को लेकर आगे चल दी। पुलिसने चोरीका माल समझ कर
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उसकी गठड़ी खुलवाई, तो उसमें लैंगड़ा निकला। सिपाही उसे हाकिमके पास ले गये। हाकिम ने पूछा—'यह क्या मामिला है ?' तू ने मर्दको गठरीमें क्यों बाँध रखा है ?'
ब्राह्मणीने जवाब दिया—'यह मेरा पति है। यह चल नहीं सकता, इसलिये मैं इसे गठरीमें धरकर घूमती हूँ। महाराज ! पतिव्रताका यही धर्म है।' हाकिम उसकी बातसे खुश होकर उसे राजाके पास ले गया। राजा उसका पतिन्हे देखकर बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसे आनन्दसे जीवन बितानेके लिए दो गाँव इनाममें दिये।
कुछ रोज बाद वह ब्राह्मण भी किसी तरह क्रूर से निकलकर उसी नगरमें आया। उस स्त्रीने उसे देखते ही राजासे प्रार्थना की, कि महाराज ! यह आदमी मेरे पतिका शत्रु है। राजाने सुनते ही, बिना विचार किये, ब्राह्मणको शूली पर चढ़ाने की आज्ञा दे दी। तब ब्राह्मणने राजासे कहा—' आप धर्मात्मा राजा है, आपने मुझे दण्ड दिया, सो तो मैं भोगूंगा ही, पर इसके पास मेरी कुछ संकान्त वस्तु है, वह मुझें दिला दीजिये। इसके बाद मुझें फाँसी पर चढ़वाइये।' राजाने कहा—'हे पतिव्रते ! तूने इसकी कुछ संकान्त वस्तु ली है ?' ब्राह्मणीने कहा—'मैंने तो इससे कुछ भी नहीं लिया है।' ब्राह्मण बोला—'तू हाथमें पानी लेकर तीन बार यह कह दे, कि इसने मुझे जो कुछ भी दिया हो, वह मैं वापस देती हूँ।' स्त्री राजाके भयसे इस बात पर राजी हो गई और तीन बार
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चैसा ही कहकर संकल्प छोड़ दिया। संकल्पका जल छोड़ते ही वह मर गई। राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ। राजाने विपसे इस घटनाका रहस्य पूछा। ब्राह्मणने सारा किस्सा ज्योंका त्यों सुना दिया। सुनते ही राजाने खुश होकर वह दोनों गाँव ब्राह्मणको दे दिये और अपने दरबारमें एक उच्च पद भी प्रदान किया।
इसीसे मुझे कहना पड़ता है कि, जिस ब्राह्मणने अपनी स्त्रीके लिये माँ-बाप और भाई-बन्धु छोड़े, अपना आधा जीवन दिया, उसी स्त्रीने उसके साथ ऐसे-ऐसे जाल किये, उसके प्राण-नाशमें भी कोई बात उठा न रखी। अब कहा, स्त्रियोंकी प्रीतिका क्या विश्वास किया जाय ? किसीने ठीक ही कहा है—
एताः स्वार्थपरा नार्थः, केवलं स्वसुखे रताः ।
न तासां बल्लभः कोऽपि, सुतोऽपि स्वसुखं विना ॥
स्वार्थपरायणा स्त्रियाँ केवल अपना सुख ही चाहती हैं। अपने सुखके आगे उन्हें कोई भी प्यारा नहीं—यहाँ तक कि अपने पेटसे पैदा हुआ पुत्र भी प्यारा नहीं।
अच्छा और भी एक कहानी सुन :—
“किसी नगरमें एक वैश्य रहता था। वह अपनी स्त्रीको अत्यधिक प्यार करता था। उसके मित्रोंने कहा—‘भाई ! तुम अपनी स्त्रीका इतना विश्वास मत करो ; स्त्रीकी प्रीतिका ज़रा
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भी भरोसा नहीं। रुबी चीज़में चिकनाई हो, कठोर वस्तुमें नरमी हो और नीरसमें रस हो, तो स्त्रियोंमें प्रेम हो सकता है।
‘मित्र ! तुम अपनी स्त्रीके झूठे प्रेममें पागल मत बनो। अगर मेरी बातपर विश्वास नहीं है, तो आज उससे विदेश जानेकी बात कहो, पर जाओ कहीं नहीं ; दिनभर मेरे घरमें रहो, रातको अपनी स्त्रीके पल्लगके नीचे घुस जाओ और तमाशा देखो।’
उस वैश्यने अपने मित्रके कहनेके मुताबिक ही अपनी स्त्रीसे विदेश जानेकी बात कही। वह भी सुनते ही प्रसन्न हो गई और उसके लिए पूरी मिठाई प्रभृति बनानेमें लग गई। किसीने कहा है—
दुर्दिवसे धनतिमिरे वर्पतिजलदे महाटवीप्रभृतौ ।
पत्युविदेशगमने परमसुखं जघन चपलायाः ॥
घटाटोप दिन या बुरे दिनोंसे, गहरे अँधेरेसे, मेह बरसनेसे, महावनसे और पतिके प्रदेश जानेसे चपल जाँघोंवाली परपुरुषरता स्त्रियाँ बहुत खुश होती हैं।
बहुत क्या, वैश्य की स्त्रीने पूरी मिठाई बाँधकर पतिको विदा कर दिया। चलते समय कहा—‘आप जल्दी आजाना। मुझे आपके बिना यह मनोहर शय्या कौंटोंसे भरी मालूम होगी। रातभर नींद न आवेगी। खैर, काम है, इसलिए जैसे-तैसे दिन काटूँगी।’
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पतिके चले जानेपर शामको उसने सावुनसे मल-मलकर खूब स्नान किया। नये-नये कपड़े और गहने पहने। कसकर पलंग तैयार किया और दूधके समान सफेद चादर बिछाई। रातको उसका यार आया और पलंगपर बैठ गया। उधर वह वैश्य भी चिराग जलते ही, दूसरे द्वारसे आकर, पलंगके नीचे छिप गया। ज्योंही वह स्त्री पलंग पर चढ़ने लगी कि, उसका पैर खाटके नीचे छिपे हुए उसके पतिसे छू गया। वह फौरन ताड़ गई कि, दुष्ट पति मेरी परीक्षा लेनेके लिए यहीं छिपा है। अब कोई बिया चरित्र करना चाहिये। ज्योंही उसका यार उसे आलिङ्गन करनेको तैयार हुआ, वह बोली—'हे महानुभाव ! आप मेरा शरीर न छूएँ। मैं पतिव्रता और महा सती हूँ। अगर छूओगे तो शाप देकर भस्म कर दूँगी। ये बातें सुनतेही उसका यार बोला—'फिर तूने मुझे बुलाया ही क्यों है ? अगर सती थी तो मुझे न बुलाती।' वह बोली—'सुनो, मैं आज देवीके दर्शन करने गई थी। देवी बोली—'पुत्री ! तू मेरी भक्त है, पर दुःख है कि तू आगामी छह महिनामें विधवा हो जायगी। हाँ, अगर तू आज रातको पर पुरुषको बुलाकर उसे आलिङ्गन करे, तो तेरे पतिको उग्र बढ़ जाय और उस पुरुषकी उग्र घट जाय। बस इसी मनोरथ-सिद्धिके लिए मैंने आपको बुलाया है।' नीचेसे अपनी स्त्रीकी बातें सुनकर वैश्य बोला—'धन्य पतिव्रते धन्य ! कुलका आनन्द वन्दन करनेवाली धन्य ! मैंने दुष्टोंकी बातोंमें आकर तेरी परीक्षा लेनी चाही थी। लेकिन तू तो पतिव्रताओंमें
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मुख्य है। तूने पत्तिकी आयु बढ़ानेके लिए ऐसा घोर तप किया, जो परपुरुषके साथ आलिङ्गन करनेको तैयार हो गई ! मेरा जैसा भाग्यवान् कौन है ? आ ! मेरे कन्धे पर चढ़ जा ! फिर उस स्त्रीके यारसे कहने लगा—'हे महानुभाव ! आप मेरे पूर्वजन्मके पुण्यसे आये हैं। आपकी कृपासे मेरी आयु बढ़ गई। आपको धन्यवाद है। आप भी मेरे कन्धेपर चढ़िये !' वह यार तो चढ़ना नहीं चाहता था, पर उसने उसे ज्वर्दस्तो चढ़ा लिया और दोनोंको कन्धोंपर लिये हुए नाचता फिरा। साथ ही उन दोनोंका गुणानुवाद भी करता रहा।
देखा बच्चा ! स्त्रीमें कितनी तेज अङ्क है। सरासर कुकम्मे देखकर भी वैश्य शान्त हो गया ; उल्टा अपनी स्त्रीकी बड़ाई करने लगा। यह सब वैश्यकी स्त्रीकी चतुराईका फल था। स्त्रियोंको जितनी जल्दी बात सूझती है, उतनी जल्दी पुरुषोंको नहीं। इसीसे कहा है—
भोजनं द्विगुणं स्त्रीणां, बुद्धिः कृते चतुर्गुणा ।
निश्चयः षड्गुणः पुंभ्यः, कामारचाष्टगुणः स्मृतः ॥
स्त्रीणां द्विगुणाहारो, लज्जा चापि चतुर्गुणा ।
साहसं षड्गुणञ्चैव कामारचाष्टगुणाः स्मृतः ॥
स्त्रियाँ मर्दोंकी अपेक्षा दूना खाती हैं। उनमें मर्दोंसे चौगुनी अङ्क, छः गुना निश्चय और अठगुना काम होता है।
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स्त्रियोंमें पुरुषोंकी अपेक्षा दूनी भूष, चौगुनी शर्म, छह गुना साहस और अठगुना काम होता है।
उशना वेद यच्छावंत्रं, यच्च वेद वृहस्पतिः।
की बुद्धया न विशिष्येतु, तस्माद्रुच्याः कथं हि ताः ॥
शुक और बृहस्पति जितने शास्त्रको जानते हैं, उतना स्त्रीका बुद्धिके सामने कुछ भी नहीं है। फिर स्त्रियोंकी रक्षा की जाय तो कैसे की जाय ?
क्यों बच्चा सन्तोष हुआ या और भी सुनना चाहता है ? अच्छा ले, एक बात और भी सुनाता हूँ,—
जाटनी और नायनका त्रिया चरित्र
“किसी नगरमें एक जाट रहता था। उसकी स्त्री कुलटा थी, पर उस बेचारेको यह बात मालूम नहीं थी। हाँ, उसके यार-दोस्त उसकी स्त्रीका हाल जानते थे। वह कहते—‘यार ! स्त्रीकी प्रीति किसी एकसे नहीं होती। स्त्री पर विश्वास करना बड़ी भूल है।’ उसके दिलमें अपने मित्रोंकी बात जम गई। वह उसको फिराकमें रहने लगा। एक दिन उसने एक संन्यासीको अपने घर भोजन कराना चाहा, इसलिये वह उसे अपने घर लिखा लाया। स्त्रीसे कहा—‘तू महाराजकी सेवा कर, मैं बाज़ारसे खीरका सामान ले आता हूँ, क्योंकि महारामजी कहते हैं—
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अमृतं शिशिरे वहिनमृतं प्रियदर्शनम् ।
अमृतं राजसम्मानमृतं क्षीरभोजनम् ॥
जाड़ुमें आग अमृत है, प्यारेका दर्शन अमृत है, राज-सम्मान अमृत है और खीरका भोजन अमृत है। इसलिये आज खीर ही बनेगी। देख, इधर-उधर मत टरख जाना।' वह तो ऐसा कहकर चल दिया। उसके जाते ही स्त्री गहने-कपड़े पहनकर संन्यासी से बोली—'आप वैडिये, मैं अपने सबीसे मिलकर अभी आती हूँ।' संन्यासीसे ऐसा कहकर वह चल दी। देवयोगसे, राहमें उसका एति उसे मिल गया। उसने देखते ही कहा—'रॉड! मैं लोगोंकी बात कूटी समझता था। पर आज मालूम हुआ, कि उनकी बात सच है। चल, तुझे आज सज़ा दूँगा। ऐसा कहता हुआ, वह उसे अपने घर ले आया। घरमें आकर, उसे खूब मारी-पीटी और कसकर एक खंभेसे बाँध दी। फिर अपने हाथोंने ही पकाकर साधुको खीर खिलाई और अपने भी खूब शराब पीकर खीर खायी। फिर वह नदोमें सो गया।
आधी रात बीतने पर, जाटको सूता समझकर, उसकी एक सखी या दूती-नायन उस स्त्रीके पास आकर कहने लगी—'देख, तेरा यार तेरे बिना मर रहा है! तु क्यों नहीं जाती?' उसने कहा—'देखती नहीं, इस हालतमें कैसे जाऊँ?' नायन ने कहा—'कठिन स्थानमें जाकर जो खादु फल खाते हैं, उन्हींका
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जन्म में, ऊँटोंकी तरह, सार्थक समझती हूँ । परलोकमें सन्देह है, जनापवाद विघ्न-विघ्न होता है और दूसरोंके साथ रमण करना अपने हाथ की बात है । जवानीके फल भोगनेवाली स्त्री ही धन्य है । देवयोगसे, एकान्त स्थानमें, दूसरा कुरूप पुरुष भी मिल जाय, तो स्त्रीको चाहिये कि, अपने सुन्दर पतिको त्यागकर उससे रमण करे । मैं तेरी जगह बंध जाती हूँ, तू उसके पास जाकर उसकी इच्छा पूरी कर ।’ यह कहकर नायनने उसे खोल दिया । फिर उस खीने नायनको अपनी जगह बाँधकर यारके घरकी राह ली ।
ज्योंही वह खी गई कि, जाट जागा और गाली देता हुआ खामेसे बंधी हुई स्त्रीके पास आया और उसकी नाक काट ली । नायन कुछ न बोली । जाटने समझा कि, मैंने अपनी स्त्री की नाक काट ली है । थोड़ी देर बाद वह खी आई । उसने नायनसे पूछा— ‘कहो सखी ! ्वैर तो है?’ नायनने कहा—‘हाँ बहन ! सब ्वैर है, केवल नाक नहीं है ।’ फिर नायन वहाँसे अपने घर चली गई और स्त्रीको वहीं बाँधती गई । तड़काऊ वह जाट फिर जागा और कहने लगा—‘राँड, अभी तो नाक काटी है, अब कान काटता हूँ ।’ सुनते ही स्त्री बोली—‘अगर मैंने कभी खममें भी परपुरुषका ध्यान न किया हो, तो ईश्वर मेरी नाक जोड़ दे और यदि मैं कुलटा हूँ तो मुझे भस्म कर दे ।’ फिर थोड़ी देर बाद बोली—‘अरे दुष्ट ! देख ! मेरी नाक फिर जुड़ गई ; अब भी क्या मैं सती
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नहीं हूँ ?' यह बात सुनते ही उसके पतिने आकर देखा, तो ज़मीन पर लून पड़ा पाया और नाक ज्यों-की-न्यों पाई। वह हजार जानसे अपनी स्त्रीकी तारीफ़ करने लगा। उधर वह महात्मा, जो खुपचाप पड़ा हुआ इस अद्भुत लीलाको देख रहा था, मन-ही-मन कहने लगा—
शम्बरस्य च या माया या माया नमुचेरपि ।
बलेः कुम्भीनसंशेव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥
शम्बरकी, नमुचिकी, बलि और कुम्भीनस की जितनी माया है, उस सबको स्त्रियाँ जानती हैं।
अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम ।
इति यास्ताः कथं धीरैः संरक्ष्याः पुरुषैरिहः ॥
जो झूठको सब और सबको झूठ कहती हैं, धीर पुरुष, इस संसारमें, उनकी रक्षा कैसे कर सकते हैं ?
नाति प्रसंगः प्रमदासुकायां
नेच्छेद्भले स्त्रीषु विवर्द्धमानम् ।
अति प्रसक्तैः पुरुषैर्मुतास्ताः
क्रीडन्ति काकैरिव लूनपक्षैः ॥
*स्त्रियोंको ज़ियादा मुँह न लगावे और उनका बल न चढ़ने दे, क्योंकि अति आसक्त हुए पुरुषोंसे वह पंक्तुचे हुए कन्धेके समान खेलती हैं।
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आगे चलकर नाईकी स्त्री अपने घर पहुँची। सवेरे हो नाई ने किसीकी हज़ामत बनानेके लिये उससे अपना उस्तरा माँगा। नाइन ने उस्तरा दूसरे फँक मारा। यह देख, नाई ने भी कोथमें भर कर उस्तरा उसीकी तरफ फँक मारा। बस, ऐसा होते ही नाइन चिल्लाने लगी—‘अरे कोई मुझे बचाओ, मेरे पतिने मुझ निरापराधिनीकी नाक काट ली है।’ लोग इकट्ठे हो गये। पुलिस नाईको पकड़ कर ले गई। राजाने नाईको शूलों चढ़ानेकी आज्ञा दी। तब नाईको बेकुसूर मारे जाते देखकर, वह संन्यासी राजसभामें जाकर बोला—‘महाराज ! नाई बेकुसूर है। यह सब खी-चरित्र है।’ फिर संन्यासीने रातकी सारी घटना कह सुनाई। राजाने नाईको छोड़ दिया और खी को जेलकी सज़ा दी।
संन्यासीकी कही हुई कहानियाँ सुनकर, मुझे उन पर अत्यन्त श्रद्धा हो गई। हम लोग सन्ध्या हुई देख अपने-अपने घर जाना चाहते थे, कि इतनेमें संन्यासीकी पीठका कपड़ा हवासे उड़ गया। उनकी आदत थी, कि वे अपनी पीठ कभी किसीको न देखने देते थे। पीठ पर हर समय कोई कपड़ा रखते थे। आज पीठका कपड़ा उड़ जानेसे, मैंने उनकी पीठपर घावका एक भारी निशान देखा। मुझे उस चिह्नको देखकर कुछ कौतुहल सा हुआ। मैंने हिम्मत करके पूछा—‘महाराज ! आपको पीठपर यह कैसे दाग है ? अगर हर्ज न हो, तो इसका भी वृत्तान्त छपा करके मुझसे कहिये।’ मेरी बात सुनते ही संन्यासी महाराज
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सिहर उठे। उनका चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने मेरी बात उड़ाकर, पीठ फिर कपड़ेसे ढकली ; पर मेरा मन उस बिहका कारण जाननेको अधीर हो उठा। सब आदमी चले गये, पर मैं रातके ग्यारह बज जानेपर भी न उठा, वहाँ बैठो ही रहा। जब एकांत हो गया, तब मैंने फिर बात छेड़ी। संन्यासीने मेरा हठ देख कर कहा—
कोई दिलसोज हो तो कौंजे वर्या।
सरसरी दिलकी वारदात नहीं ॥ हाली ॥
भैया, कोई सहृदय हो तो दिलका हाल सुनावें। यह साधारण घटना नहीं, जो हर किसीको सुना दी जाय।
मुसीबतका इक-इक से अहवाल कहना।
मुसीबत से है वह मुसीबत जियादा ॥
जिस-तिससे अपनी मुसीबतकी कहानी कहते फिरना— मुसीबत से भी जियादा मुसीबत है।
मैंने कहा—“महाराज ! मैं आपका हूँ। मैं आपके लिए जान देने तकको तैयार हूँ। आपको कही हुई बात जीवन-भर मेरे ही अन्दर रहेगी। मेरे, आपके और ईश्वरके सिवा उसे और कोई न जानीगा। आप कृपा करके मुझसे सारी बात बेकटके कहिये।” तब महात्मा जो बोले—“अच्छा बच्चा ! सुनोगे ही, बिना सुने न मानोगे ? अच्छा लो सुनो :—
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संन्यासी की आत्म कथा ।
मैंने एक धनी घरमें जन्म लिया था। छोटी ही उम्रमें, मुझे बच्चा छोड़कर मेरे माँ-बाप स्वर्गको सिधार गये, पर मेरे लिए अच्छी खासी संपत्ति और आमदनी छोड़ गये। चूँ कि मेरा जन्म शुद्ध-धर्मानेमें हुआ था, इसलिये मेरे जिजमान भी बहुत थे। हमारे यहाँ पुरोहिताई होती थी, जिजमानोंके यहाँ से खूब धनधान्य मिलता था। हर तरह पौ बारह थे। पाँचों उंगली सदा घीमें रहती थीं। मेरे बेटह आमदनी थी, तोभी, मैं धन बढ़ानेकी इच्छासे लेन-देन या बोरगपत करता था। अङ्गुस-पङ्गुस मुहल्ले-टोळे और दूर-दूरके गाँवोंके आदमियोंको मैं हूण्डनोट, तमस्फुक और हुण्डी लिखा-लिखाकर सूद पर कर्ज देता था। पुरोहिताईकी आमदनी तो थी ही, अब व्याजसे भी खूब रुपया बढ़ने लगा। उस नगरमें मैंही सबसे बड़ा धनी गिना जाने लगा। धनकी वजहसे मेरा रौब-दौब भी खूब था। थोड़े दिनोंमें, मैं म्यूनिसिपैलिटीका चेयरमैन हो गया। सरकारने भी मुझे राय बहादुरकी पदवीसे विभूषित किया। जिन्दगी खूब आरामसे बसर हो रही थी। खुशामदी हर वक्त घेरे रहते थे। कह चुका हूँ, कि मेरे माँ-बाप मुझे छोटा ही छोड़कर मर गये थे, इसलिये अबतक मेरा विश्वाह न हुआ। यार-दोस्त और नाते-रिश्तेदार सभी मुझे शादी कर लेनेको दबाने लगे। कोई कहता, बिना स्त्रोंके यह धन-
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वेभव किसी कामका नहीं। घरवालो बिना घर केसा ? कहा है :—
न ग्रहं ग्रहमिलाहूर्गहिणी ग्रहमुच्यते । ग्रहं हि ग्रहिणीहीनमरण्यसदृशं मतम् ॥
माता यस्य ग्रहं नार्स्त, भायां च प्रियवादिनी । अरण्ये तेन गन्तव्यं, यथारण्यं तथा गृहम् ॥
घरका नाम घर नहीं है ; किन्तु स्त्रोका नाम घर है । ग्रहिणी बिना घर बनके समान है ।
जिसके घरमें माता नहीं है और मधुरभाषिणी स्त्री भी नहीं है, उसको घर छोड़कर बनमें चला जाना चाहिये ; क्योंकि माता और स्त्री-हीन घर बनके ही समान है ।
किसीने कहा वराह मिहिर जी कह गये हैं—
जये धरिन्याः पुरमेव सारं
पुरे गृहं सद्मनिचैकं देशः ।
तत्वापि शय्या शयने वरा
स्त्रीरलोञ्जला राज्यसुखस्य सारः ॥
कोई कहने लगा—
अपत्यं धर्मकार्याणिगुशुधारतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्गं पितृणांमात्मवश्वह ॥