शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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आगे चलकर नाईकी स्त्री अपने घर पहुँची। सवेरे हो नाई ने किसीकी हज़ामत बनानेके लिये उससे अपना उस्तरा माँगा। नाइन ने उस्तरा दूसरे फँक मारा। यह देख, नाई ने भी कोथमें भर कर उस्तरा उसीकी तरफ फँक मारा। बस, ऐसा होते ही नाइन चिल्लाने लगी—‘अरे कोई मुझे बचाओ, मेरे पतिने मुझ निरापराधिनीकी नाक काट ली है।’ लोग इकट्ठे हो गये। पुलिस नाईको पकड़ कर ले गई। राजाने नाईको शूलों चढ़ानेकी आज्ञा दी। तब नाईको बेकुसूर मारे जाते देखकर, वह संन्यासी राजसभामें जाकर बोला—‘महाराज ! नाई बेकुसूर है। यह सब खी-चरित्र है।’ फिर संन्यासीने रातकी सारी घटना कह सुनाई। राजाने नाईको छोड़ दिया और खी को जेलकी सज़ा दी।
संन्यासीकी कही हुई कहानियाँ सुनकर, मुझे उन पर अत्यन्त श्रद्धा हो गई। हम लोग सन्ध्या हुई देख अपने-अपने घर जाना चाहते थे, कि इतनेमें संन्यासीकी पीठका कपड़ा हवासे उड़ गया। उनकी आदत थी, कि वे अपनी पीठ कभी किसीको न देखने देते थे। पीठ पर हर समय कोई कपड़ा रखते थे। आज पीठका कपड़ा उड़ जानेसे, मैंने उनकी पीठपर घावका एक भारी निशान देखा। मुझे उस चिह्नको देखकर कुछ कौतुहल सा हुआ। मैंने हिम्मत करके पूछा—‘महाराज ! आपको पीठपर यह कैसे दाग है ? अगर हर्ज न हो, तो इसका भी वृत्तान्त छपा करके मुझसे कहिये।’ मेरी बात सुनते ही संन्यासी महाराज