शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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सिहर उठे। उनका चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने मेरी बात उड़ाकर, पीठ फिर कपड़ेसे ढकली ; पर मेरा मन उस बिहका कारण जाननेको अधीर हो उठा। सब आदमी चले गये, पर मैं रातके ग्यारह बज जानेपर भी न उठा, वहाँ बैठो ही रहा। जब एकांत हो गया, तब मैंने फिर बात छेड़ी। संन्यासीने मेरा हठ देख कर कहा—
कोई दिलसोज हो तो कौंजे वर्या।
सरसरी दिलकी वारदात नहीं ॥ हाली ॥
भैया, कोई सहृदय हो तो दिलका हाल सुनावें। यह साधारण घटना नहीं, जो हर किसीको सुना दी जाय।
मुसीबतका इक-इक से अहवाल कहना।
मुसीबत से है वह मुसीबत जियादा ॥
जिस-तिससे अपनी मुसीबतकी कहानी कहते फिरना— मुसीबत से भी जियादा मुसीबत है।
मैंने कहा—“महाराज ! मैं आपका हूँ। मैं आपके लिए जान देने तकको तैयार हूँ। आपको कही हुई बात जीवन-भर मेरे ही अन्दर रहेगी। मेरे, आपके और ईश्वरके सिवा उसे और कोई न जानीगा। आप कृपा करके मुझसे सारी बात बेकटके कहिये।” तब महात्मा जो बोले—“अच्छा बच्चा ! सुनोगे ही, बिना सुने न मानोगे ? अच्छा लो सुनो :—