भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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संन्यासी की आत्म कथा ।

मैंने एक धनी घरमें जन्म लिया था। छोटी ही उम्रमें, मुझे बच्चा छोड़कर मेरे माँ-बाप स्वर्गको सिधार गये, पर मेरे लिए अच्छी खासी संपत्ति और आमदनी छोड़ गये। चूँ कि मेरा जन्म शुद्ध-धर्मानेमें हुआ था, इसलिये मेरे जिजमान भी बहुत थे। हमारे यहाँ पुरोहिताई होती थी, जिजमानोंके यहाँ से खूब धनधान्य मिलता था। हर तरह पौ बारह थे। पाँचों उंगली सदा घीमें रहती थीं। मेरे बेटह आमदनी थी, तोभी, मैं धन बढ़ानेकी इच्छासे लेन-देन या बोरगपत करता था। अङ्गुस-पङ्गुस मुहल्ले-टोळे और दूर-दूरके गाँवोंके आदमियोंको मैं हूण्डनोट, तमस्फुक और हुण्डी लिखा-लिखाकर सूद पर कर्ज देता था। पुरोहिताईकी आमदनी तो थी ही, अब व्याजसे भी खूब रुपया बढ़ने लगा। उस नगरमें मैंही सबसे बड़ा धनी गिना जाने लगा। धनकी वजहसे मेरा रौब-दौब भी खूब था। थोड़े दिनोंमें, मैं म्यूनिसिपैलिटीका चेयरमैन हो गया। सरकारने भी मुझे राय बहादुरकी पदवीसे विभूषित किया। जिन्दगी खूब आरामसे बसर हो रही थी। खुशामदी हर वक्त घेरे रहते थे। कह चुका हूँ, कि मेरे माँ-बाप मुझे छोटा ही छोड़कर मर गये थे, इसलिये अबतक मेरा विश्वाह न हुआ। यार-दोस्त और नाते-रिश्तेदार सभी मुझे शादी कर लेनेको दबाने लगे। कोई कहता, बिना स्त्रोंके यह धन-