भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २६७ )

वेभव किसी कामका नहीं। घरवालो बिना घर केसा ? कहा है :—

न ग्रहं ग्रहमिलाहूर्गहिणी ग्रहमुच्यते । ग्रहं हि ग्रहिणीहीनमरण्यसदृशं मतम् ॥

माता यस्य ग्रहं नार्स्त, भायां च प्रियवादिनी । अरण्ये तेन गन्तव्यं, यथारण्यं तथा गृहम् ॥

घरका नाम घर नहीं है ; किन्तु स्त्रोका नाम घर है । ग्रहिणी बिना घर बनके समान है ।

जिसके घरमें माता नहीं है और मधुरभाषिणी स्त्री भी नहीं है, उसको घर छोड़कर बनमें चला जाना चाहिये ; क्योंकि माता और स्त्री-हीन घर बनके ही समान है ।

किसीने कहा वराह मिहिर जी कह गये हैं—

जये धरिन्याः पुरमेव सारं

पुरे गृहं सद्मनिचैकं देशः ।

तत्वापि शय्या शयने वरा

स्त्रीरलोञ्जला राज्यसुखस्य सारः ॥

कोई कहने लगा—

अपत्यं धर्मकार्याणिगुशुधारतिरुत्तमा ।

दाराधीनस्तथा स्वर्गं पितृणांमात्मवश्वह ॥